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अधिवक्ता निलेश ओझा को झटका: सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में हस्तक्षेप से किया इनकार, बॉम्बे हाईकोर्ट की कार्यवाही जारी

Rajan Prajapati
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सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की अवमानना कार्यवाही में दखल से इनकार किया, कहा न्यायपालिका पर बिना आधार आरोप सार्वजनिक विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं। - निलेश सी. ओझा बनाम बॉम्बे उच्च न्यायालय और अन्य।

अधिवक्ता निलेश ओझा को झटका: सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में हस्तक्षेप से किया इनकार, बॉम्बे हाईकोर्ट की कार्यवाही जारी

सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता निलेश सी. ओझा से जुड़े अवमानना मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई आपराधिक अवमानना कार्यवाही को इस चरण पर रोका नहीं जा सकता और उसे आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अधिवक्ता निलेश सी. ओझा द्वारा दायर अपीलों से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू की थी।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक याचिका की सुनवाई से पहले ओझा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक मौजूदा न्यायाधीश पर आरोप लगाए और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया। इसके बाद संबंधित न्यायाधीश ने इस पर आपत्ति जताई और मुख्य न्यायाधीश ने स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना कार्यवाही शुरू कर दी।

बाद में ओझा ने आवेदन देकर उस न्यायाधीश को पक्षकार बनाने और कार्यवाही से राहत पाने की मांग की, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की बुनियादी विशेषता बताते हुए कहा कि इसका आधार जनता का विश्वास है।

अदालत ने कहा,

“न्यायपालिका की ताकत जनता के भरोसे में निहित है, और इस भरोसे को कमजोर करने वाली कोई भी कार्रवाई गंभीर चिंता का विषय है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों की आलोचना करना एक अधिकार है, लेकिन यह आलोचना संयमित और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। व्यक्तिगत आरोप या बिना आधार के टिप्पणियां न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

अदालत ने यह भी कहा,

“किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता पर बिना ठोस आधार के आरोप लगाना न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।”

पीठ ने अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी पर विशेष जोर देते हुए कहा कि वे न्यायालय के अधिकारी होते हैं और उनसे उच्च स्तर की पेशेवर मर्यादा की अपेक्षा की जाती है।

अदालत ने माना कि सार्वजनिक मंच पर लंबित मामलों पर इस तरह की टिप्पणी करना उचित नहीं है और इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर हाईकोर्ट के आदेशों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि,

“मामले में उठाए गए सभी मुद्दों पर हाईकोर्ट स्वयं कानून के अनुसार विचार कर सकता है।”

इसके साथ ही अदालत ने अपीलों को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह मामले की सुनवाई शीघ्रता से और स्वतंत्र रूप से करे।

Case Details

Case Title: Nilesh C. Ojha v. High Court of Judicature at Bombay & Ors.

Case Number: Criminal Appeal Nos. 5673–5674 of 2025

Judge: Justice Vikram Nath & Justice Sandeep Mehta

Decision Date: April 20, 2026

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