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कस्टडी में मारपीट के आरोपी पुलिस अधिकारी इस चरण पर CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट

Zaved Khan
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में कथित मारपीट कर स्वीकारोक्ति लेने का आरोप प्रथम दृष्टया आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है। इसलिए वर्तमान चरण में धारा 197 CrPC के तहत पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है। - Sanjay Bapuso Dalvi v. State of Maharashtra & Anr. (With Mahesh Suresh Kore & Anr. v. State of Maharashtra & Anr.)

कस्टडी में मारपीट के आरोपी पुलिस अधिकारी इस चरण पर CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या की जांच के दौरान एक व्यक्ति के साथ पुलिस हिरासत में कथित मारपीट के मामले में तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले के वर्तमान चरण में आरोपित कृत्यों को पुलिस अधिकारियों के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता, इसलिए अभियोजन के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी स्वीकृति आवश्यक नहीं है।

न्यायमूर्ति संदीप डी. पाटिल ने दोनों आपराधिक रिट याचिकाएं खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि यदि मुकदमे के दौरान ऐसा साक्ष्य सामने आता है जिससे यह प्रतीत हो कि संबंधित कृत्य वास्तव में आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े थे, तो धारा 197 के तहत स्वीकृति का प्रश्न बाद के चरण में दोबारा विचार के लिए खुला रहेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इचलकरंजी द्वारा पारित उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) द्वारा उन्हें आरोपमुक्त करने से इनकार करने वाले आदेश को बरकरार रखा गया था। इससे पहले मजिस्ट्रेट ने सात पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 326, 325, 324, 342, 348, 504, 506 तथा धारा 34 के तहत समन जारी करने का आदेश दिया था।

शिकायत के अनुसार, उत्तरदाता यासीन बी. मांकापुरे को नवंबर 2008 में एक हत्या के मामले की जांच के सिलसिले में शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन, इचलकरंजी बुलाया गया था। उनका आरोप था कि उन्हें रातभर थाने में रोके रखा गया, भोजन नहीं दिया गया, हत्या स्वीकार करने के लिए दबाव बनाया गया और बेल्ट तथा अन्य तरीकों से उनकी बेरहमी से पिटाई की गई। शिकायत में यह भी कहा गया कि उनकी हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि जांच के लिए बुलाए गए डॉक्टर ने तत्काल अस्पताल ले जाने की सलाह दी थी।

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शिकायतकर्ता और उसके गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद मजिस्ट्रेट ने पाया कि अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। बाद में आरोपमुक्त करने की मांग करने वाले आवेदन मजिस्ट्रेट और पुनरीक्षण अदालत, दोनों ने खारिज कर दिए, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

पुलिस अधिकारियों की ओर से कहा गया कि जिन आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ कार्यवाही की जा रही है, वे एक आपराधिक मामले की जांच के दौरान किए गए कार्यों से संबंधित हैं। इसलिए उनके विरुद्ध अभियोजन चलाने से पहले CrPC की धारा 197 के तहत सक्षम सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य थी।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का अतिक्रमण भी कर देता है, तब भी यदि उस कार्य और उसके आधिकारिक दायित्व के बीच उचित संबंध हो, तो अभियोजन से पहले स्वीकृति आवश्यक होती है। उनके अनुसार निचली दोनों अदालतों ने धारा 197 की गलत व्याख्या की।

शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि हिरासत में यातना देना या तथाकथित "थर्ड डिग्री" का इस्तेमाल करना किसी भी पुलिस अधिकारी के वैधानिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता। यह भी कहा गया कि मजिस्ट्रेट और पुनरीक्षण अदालत दोनों पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि आरोपित कृत्य धारा 197 के संरक्षण के दायरे में नहीं आते।

शिकायतकर्ता ने यह भी बताया कि कथित मारपीट के कारण वह कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा और उसे लकवे जैसी गंभीर शारीरिक समस्या हुई, जिसके कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी हुई।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति संदीप डी. पाटिल ने धारा 197 CrPC के दायरे पर सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक कसौटी यह है कि क्या आरोपित कार्य का आधिकारिक कर्तव्य से उचित और वास्तविक संबंध है या फिर सरकारी पद का केवल दुरुपयोग किया गया है।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता का आरोप केवल इतना नहीं है कि जांच के दौरान बल प्रयोग किया गया, बल्कि यह है कि उसे अवैध रूप से हिरासत में रखकर अपराध स्वीकार कराने के लिए उसकी पिटाई की गई।

अदालत ने कहा,

"जांच के नाम पर पुलिस अधिकारी किसी भी व्यक्ति के साथ थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं कर सकते।"

यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो ऐसे कृत्यों को आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि किसी संदिग्ध से स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के लिए उसके साथ मारपीट करना किसी भी स्थिति में आधिकारिक दायित्व का निर्वहन नहीं कहा जा सकता। इसलिए वर्तमान चरण में धारा 197 अभियोजन की राह में बाधा नहीं बनती।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वीकृति का प्रश्न हमेशा के लिए समाप्त नहीं हुआ है। यदि मुकदमे के दौरान ऐसा साक्ष्य सामने आता है जिससे यह साबित हो कि संबंधित कृत्य आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े थे, तो ट्रायल कोर्ट उस प्रश्न पर दोबारा विचार कर सकती है।

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेशों में कोई ऐसी कानूनी त्रुटि नहीं है, जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे। इसलिए दोनों आपराधिक रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि ट्रायल के दौरान उपयुक्त साक्ष्य सामने आते हैं, तो धारा 197 के तहत स्वीकृति का मुद्दा बाद के चरण में पुनः उठाया जा सकता है।

Case Details:

Case Title: Sanjay Bapuso Dalvi v. State of Maharashtra & Anr. (With Mahesh Suresh Kore & Anr. v. State of Maharashtra & Anr.)

Case Number: Criminal Writ Petition No. 2509 of 2022 with Criminal Writ Petition No. 2511 of 2022

Judge: Justice Sandesh D. Patil

Decision Date: 9 July 2026

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