एक फोटो स्टूडियो में हुई घटना से जुड़ा मामला आखिरकार पटना हाईकोर्ट में जाकर सुलझा। न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह ने 09.07.2026 को अपने फैसले में 2013 की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रेप के प्रयास के आरोप को शक से परे साबित नहीं कर पाया, हालांकि रिकॉर्ड में इतना जरूर था कि आरोपी ने एक छोटा अपराध किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जनवरी 2008 का है। पुलिस शिकायत के अनुसार, एक युवती अपने पिता के साथ बांका ज़िले के अमरपुर में एक स्टूडियो में फ़ोटो खिंचवाने गई थी। आरोप है कि स्टूडियो के मालिक ने उसे अंदर बुलाया और उसके पिता से कहा कि वे कंप्यूटर स्क्रीन पर फ़ोटो देखने के लिए बाहर इंतज़ार करें। जैसे ही पिता बाहर निकले, आरोपी ने कथित तौर पर स्टूडियो का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। इसके बाद, रेप करने की नीयत से उसने युवती को गलत तरीके से छूना शुरू किया और उसकी सलवार उतारने की कोशिश की। युवती के चिल्लाने पर उसके पिता ने धक्का देकर दरवाज़ा खोला और बाहर भीड़ जमा होते ही आरोपी वहाँ से भाग गया।
एक दिन बाद FIR दर्ज हुई और जांच के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 376/511 (रेप का प्रयास) और 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी करार दिया था। उसे तीन साल की सश्रम कैद और जुर्माना, साथ ही छह महीने की अलग सजा सुनाई गई थी, जो साथ-साथ चलनी थी। इसी सजा को उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट में दलीलें
आरोपी के वकील ने दलील दी कि सजा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि घटना और FIR दर्ज होने के बीच एक दिन की देरी थी, जिसकी कोई संतोषजनक वजह नहीं बताई गई। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया था और यह अपराध गंभीर प्रकृति का है।
सबूतों पर कोर्ट की नजर
हाईकोर्ट ने पांचों गवाहों के बयानों की जांच की। इनमें से जिस जांच अधिकारी ने चार्जशीट दाखिल की थी, उसे कभी अदालत में पेश ही नहीं किया गया, और एक गवाह मुकर गया। ऐसे में मामला मुख्य रूप से पीड़िता और उसके पिता के बयान पर टिका रहा, जबकि मां का बयान महज सुनी-सुनाई बात थी क्योंकि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थी।
ट्रायल के दौरान कोई मेडिकल ऑफिसर पेश नहीं किया गया, यानी रेप के प्रयास के दावे की पुष्टि करने वाला कोई मेडिकल सबूत मौजूद नहीं था। कोर्ट ने कहा कि यह कमी इसलिए मायने रखती है क्योंकि मामला मुख्यतः ऐसे गवाहों पर निर्भर था जिनका इस मामले में सीधा हित जुड़ा हुआ था।
जस्टिस सिंह ने कृष्ण कुमार मलिक बनाम हरियाणा राज्य और राय संदीप बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि पीड़िता का अकेला बयान भी सजा के लिए काफी हो सकता है, लेकिन तभी जब वह "सटीक गुणवत्ता" का हो, यानी उसमें कोई बड़ी खामी या विरोधाभास न हो। बेंच ने कहा कि अगर बयान इस स्तर तक खरा नहीं उतरता, तो सजा देने से पहले स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
कोर्ट की टिप्पणियां
फैसले में रेप के प्रयास और महिला की गरिमा भंग करने के अपराध के बीच स्पष्ट फर्क बताया गया। कोर्ट ने कहा, "पेनेट्रेशन के किसी भी सबूत के अभाव में, चाहे वह कितना भी मामूली क्यों न हो, या ऐसे किसी स्पष्ट कृत्य के बिना जो रेप के प्रयास को साबित करे, धारा 375 आईपीसी और परिणामस्वरूप धारा 376/511 के तत्व मेडिकल पुष्टि के बिना पूरे नहीं होते।"
हालांकि कोर्ट ने आरोपी को पूरी तरह क्लीन चिट नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि युवती को स्टूडियो में बंद करना, दरवाजा बंद करना, उसके कपड़े उतारने की कोशिश करना और उसे छूना यह सब बल प्रयोग है, जो महिला की गरिमा भंग करने की नीयत से किया गया था और यह धारा 354 आईपीसी के दायरे में आता है, भले ही रेप के प्रयास वाली ऊंची कसौटी पर खरा न उतरे।
FIR में देरी को लेकर कोर्ट ने पीड़िता की उस बात को स्वीकार किया कि परिवार घटना वाले दिन ही थाने गया था, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया, और अगले दिन FIR दर्ज हुई। कोर्ट ने कहा कि इसमें अभियोजन पक्ष की कोई गलती नहीं मानी जा सकती।
फैसला
पटना हाईकोर्ट ने 31.10.2013 की दोषसिद्धि और 01.11.2013 के सजा आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को धारा 376/511 आईपीसी के आरोपों से बरी कर दिया। चूंकि वह पहले से जमानत पर था, उसे जमानत बॉन्ड से मुक्त कर दिया गया और जमा की गई जुर्माना राशि वापस करने का आदेश दिया गया।
अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत के रिकॉर्ड फैसले की कॉपी सहित वापस भेजने का निर्देश दिया गया।
Case Details
Case Title: Himanshu Kr. Pathak @ Mithiya Pathak v. State of Bihar
Case Number: Criminal Appeal (SJ) No. 775 of 2013
Judge: Justice Purnendu Singh
Decision Date: July 9, 2026



















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