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पटना हाईकोर्ट ने बोधगया सड़क जाम मामले में मंत्री संतोष सुमन के खिलाफ संज्ञान आदेश रद्द किया, कहा-“सिर्फ भाषण अपराध नहीं”

Shivam
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संतोष कुमार सुमन उर्फ ​​संतोष मांझी बनाम बिहार राज्य - पटना उच्च न्यायालय ने 2017 के बोधगया सड़क अवरोध मामले में बिहार के एक मंत्री के खिलाफ निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि किसी भी प्रकार के हमले का आरोप नहीं लगाया गया था।

पटना हाईकोर्ट ने बोधगया सड़क जाम मामले में मंत्री संतोष सुमन के खिलाफ संज्ञान आदेश रद्द किया, कहा-“सिर्फ भाषण अपराध नहीं”

पटना हाईकोर्ट ने बोधगया थाना कांड संख्या 199/2017 से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने संतोष कुमार सुमन उर्फ संतोष मांझी जो वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री हैं के खिलाफ 12 फरवरी 2021 को पारित संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आरोप नहीं है जिससे यह दिखे कि याचिकाकर्ता ने हिंसा या किसी अपराध में सीधी भूमिका निभाई हो; उनके खिलाफ केवल सभा को संबोधित करने की बात कही गई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत 1 अप्रैल 2017 की घटना से जुड़ी है। पुलिस के अनुसार, बोधगया के डोमुहाने चौक पर सड़क जाम की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचने पर पुलिस ने देखा कि कुछ लोग टायर जला रहे थे, लाठी-डंडे लेकर नारेबाजी कर रहे थे और राहगीरों से दुर्व्यवहार हो रहा था।

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आरोप है कि कुछ व्यक्तियों ने भीड़ को उकसाया, एक महिला के साथ बदसलूकी हुई, और एक अधिकारी पर हमला भी हुआ। इसके अलावा, एक टेंपो के शीशे टूटने की बात भी एफआईआर में दर्ज है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर कई धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई और बाद में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, गया ने संज्ञान लिया।

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याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उन्हें राजनीतिक विरोध के कारण झूठा फंसाया गया है। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि संतोष सुमन की भूमिका सिर्फ इतनी बताई गई है कि वे सभा को संबोधित कर रहे थे। न तो उन पर किसी पर हमला करने का आरोप है और न ही तोड़फोड़ या उकसावे का ठोस प्रमाण। उन्होंने यह भी कहा कि संज्ञान आदेश बिना पर्याप्त साक्ष्य और बिना विचार किए पारित किया गया।

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राज्य की ओर से याचिका का विरोध किया गया, लेकिन यह स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर में मुख्य आरोप यही है कि वे सभा को संबोधित कर रहे थे। राज्य के वकील ने अदालत को बताया कि प्रत्यक्ष हिंसा या हमले से जोड़ने वाला कोई विशिष्ट आरोप उनके खिलाफ नहीं दिखता।

कोर्ट की टिप्पणी

न्यायालय ने एफआईआर और दोनों पक्षों की दलीलें देखने के बाद कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि याचिकाकर्ता ने किसी पर हमला किया या हिंसक गतिविधियों में हिस्सा लिया।

पीठ ने टिप्पणी की,

“केवल सभा को संबोधित करना, अपने-आप में, अभियोजन के आरोपों को टिकाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

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अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए ठोस आरोप और सामग्री का होना जरूरी है।

फैसला

इन तथ्यों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और 12 फरवरी 2021 का संज्ञान आदेश याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत केवल याचिकाकर्ता तक सीमित है और अन्य आरोपियों के मामले पर इसका स्वतः कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Case Title:- Santosh Kumar Suman @ Santosh Manjhi vs State of Bihar

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Order Date:- 3 February 2026

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