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इलाहाबाद उच्च न्यायालय: यदि पुलिस मजिस्ट्रेटों को धमकाने का प्रयास करती है तो मजिस्ट्रेट अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस कार्रवाई की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को एफआईआर दर्ज कराने और जांच के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष बीएनएसएस (उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय सुरक्षा सेवा) के उपायों का उपयोग करने का निर्देश दिया। - संदीप औदिच्या बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

इलाहाबाद उच्च न्यायालय: यदि पुलिस मजिस्ट्रेटों को धमकाने का प्रयास करती है तो मजिस्ट्रेट अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि हर मामले में सिर्फ अधिकारियों को निर्देश देने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि जब कानून में वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो, तो सीधे हाईकोर्ट आना सही रास्ता नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला संदीप औदिच्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि पुलिस अधीक्षक, फर्रुखाबाद को उसकी 19 अगस्त 2025 की शिकायत पर समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए।

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याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, इसलिए अदालत हस्तक्षेप करे।

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जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने इस प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की।

अदालत ने कहा,

“बार-बार केवल प्रतिनिधित्व तय कराने के आदेश मांगने से यह अदालत लगभग शक्तिहीन हो जाती है, जबकि हमारा काम विवाद का निपटारा करना है।”

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पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में स्पष्ट प्रावधान हैं-

• यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो शिकायतकर्ता पुलिस अधीक्षक को लिख सकता है

• अगर वहां भी सुनवाई नहीं होती, तो मजिस्ट्रेट के पास जाने का अधिकार है

अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के पास जाना ही उचित कानूनी उपाय है।

कोर्ट ने विस्तार से बताया कि BNSS के तहत:

• धारा 173(4): पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजी जा सकती है

• धारा 175(3): मजिस्ट्रेट को आवेदन देकर जांच का आदेश दिलाया जा सकता है

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अदालत ने यह भी माना कि कभी-कभी पुलिस अधिकारियों का दबाव मजिस्ट्रेट पर पड़ सकता है, लेकिन यह कारण नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति कानूनी उपाय ही न अपनाए।

अदालत ने साफ कहा कि जब वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद है, तो हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

अंततः याचिका को संक्षेप में खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित आवेदन दाखिल करे।

साथ ही, आदेश की प्रति संबंधित पुलिस अधिकारियों को भेजने का निर्देश भी दिया गया।

Case Title: Sandeep Audichya vs State of Uttar Pradesh and Others

Case Number: Criminal Misc. Writ Petition No. 1332 of 2026

Decision Date: March 9, 2026

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