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सुप्रीम कोर्ट ने महिला के नहाने का वीडियो अपलोड करने की धमकी देने के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, कहा कि ऐसे कृत्य निजता और गरिमा पर हमला करते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने महिला का निजी वीडियो सोशल मीडिया पर डालने की धमकी को उसकी गरिमा और निजता पर हमला मानते हुए आरोपी की सजा बरकरार रखी। - विजयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य

सुप्रीम कोर्ट ने महिला के नहाने का वीडियो अपलोड करने की धमकी देने के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, कहा कि ऐसे कृत्य निजता और गरिमा पर हमला करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के एक व्यक्ति की आपराधिक धमकी मामले में सजा बरकरार रखते हुए कहा है कि किसी महिला के निजी वीडियो को सोशल मीडिया पर डालने की धमकी उसकी गरिमा, निजता और यौन स्वायत्तता पर सीधा हमला है। अदालत ने माना कि ऐसा कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 506 भाग-II के तहत “अशोभनीयता का आरोप लगाने” की श्रेणी में आ सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2015 में दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने विवाह का आश्वासन देकर उससे संबंध बनाए और बाद में उसके नहाते समय रिकॉर्ड किए गए कथित वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करने की धमकी दी। महिला का कहना था कि आरोपी इस वीडियो का डर दिखाकर उसे दबाव में रखता था और संपर्क न करने के लिए मजबूर करता था।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 376, 493 और 354C IPC के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन धारा 506 भाग-II के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष की सजा सुनाई थी। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा।

इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर कहा कि जब अन्य आरोप साबित नहीं हुए, तो केवल आपराधिक धमकी का अपराध भी टिक नहीं सकता। उसने यह भी दलील दी कि कथित वीडियो या मोबाइल फोन की बरामदगी नहीं हुई थी।

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न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने आरोपी की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि एक ही घटनाक्रम से जुड़े अलग-अलग अपराधों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा,

“हर अपराध को स्वतंत्र रूप से परखा जाना आवश्यक है।” अदालत ने माना कि भले ही अन्य आरोप साबित न हुए हों, लेकिन यदि आपराधिक धमकी के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं तो दोषसिद्धि कायम रह सकती है।

फैसले में अदालत ने महिलाओं की निजता और डिजिटल युग में गरिमा के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की निजी तस्वीर या वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी उसकी प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर गंभीर आघात है।

अदालत ने यह भी कहा कि “चैस्टिटी” (Chastity) या शील को केवल पारंपरिक नैतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और अपनी यौन पहचान पर नियंत्रण के अधिकार के संदर्भ में समझना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल वीडियो या मोबाइल फोन बरामद न होने से अभियोजन का मामला स्वतः कमजोर नहीं हो जाता। यदि अन्य विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हों, तो अपराध साबित किया जा सकता है।

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही को उसकी बहनों और अन्य गवाहों के बयानों से समर्थन मिला, जिन्होंने उसे वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी को लेकर परेशान देखा था।

पीठ ने यह भी कहा कि निजी संबंधों में होने वाली घटनाओं के स्वतंत्र प्रत्यक्ष गवाह अक्सर नहीं होते, इसलिए परिस्थितियों और व्यवहार को भी साक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष धारा 506 भाग-II IPC के तहत आपराधिक धमकी का अपराध साबित करने में सफल रहा है। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Vijayakumar v. State of Tamil Nadu

Case Number: Criminal Appeal No. 2859 of 2025

Judge: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: May 22, 2026

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