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सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस, कहा- EWS आरक्षण से रियायती शुल्क का अधिकार नहीं मिलता

Zaved Khan
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सुप्रीम कोर्ट ने EWS अभ्यर्थी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का आरक्षण केवल प्रवेश के लिए है, निजी मेडिकल कॉलेजों में रियायती फीस का अधिकार नहीं देता - Harshvardhan Singh v. State of Rajasthan & Ors.

सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस, कहा- EWS आरक्षण से रियायती शुल्क का अधिकार नहीं मिलता

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना को चुनौती देने वाली एक याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण का लाभ प्रवेश प्रक्रिया तक सीमित है और इससे निजी मेडिकल कॉलेजों में रियायती या सब्सिडी वाली फीस का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं होता।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें राज्य की फीस नियामक समिति द्वारा तय फीस को वैध माना गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता राजस्थान का एक 22 वर्षीय NEET-UG अभ्यर्थी था, जो सामान्य वर्ग से संबंधित होने के साथ-साथ EWS प्रमाणपत्र भी रखता था। उसका तर्क था कि राज्य के निजी मेडिकल कॉलेजों में वार्षिक ट्यूशन फीस लगभग ₹18.9 लाख से ₹25 लाख तक है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि जब EWS श्रेणी के लिए आय सीमा ₹8 लाख वार्षिक निर्धारित है, तब इतनी अधिक फीस आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा को लगभग असंभव बना देती है। उसने फीस को उचित और वहनीय बनाने के लिए अदालत से निर्देश जारी करने की मांग की थी।

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हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट की एकल पीठ और बाद में खंडपीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और निजी संस्थानों के बीच मूलभूत अंतर पर जोर दिया।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा,

“यह नहीं कहा जा सकता कि निजी शैक्षणिक संस्थान वही फीस लें जो सरकारी संस्थान लेते हैं। दोनों की प्रकृति अलग है।”

अदालत ने कहा कि सरकारी कॉलेजों को राज्य से अनुदान और आर्थिक सहायता मिलती है, जबकि निजी मेडिकल कॉलेज स्व-वित्तपोषित संस्थान होते हैं।

पूर्व के न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा,

“कैपिटेशन फीस (अवैध अतिरिक्त शुल्क) प्रतिबंधित है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कॉलेज सामान्य फीस नहीं ले सकते।”

पीठ ने यह भी कहा कि यदि निजी कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों के बराबर फीस लेने के लिए बाध्य किया गया, तो मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भूमिका प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने टिप्पणी की,

“चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निजी मेडिकल कॉलेजों का योगदान समाप्त हो जाएगा। देश को डॉक्टरों की आवश्यकता है।”

जब याचिकाकर्ता की ओर से फीस वहन करने में असमर्थता का मुद्दा उठाया गया, तो अदालत ने कहा कि छात्र छात्रवृत्ति, वित्तीय सहायता योजनाओं या सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि फीस संरचना राज्य फीस नियामक समिति द्वारा तय की गई थी और यह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि 103वें संविधान संशोधन के तहत दिया गया EWS आरक्षण केवल प्रवेश के अवसर से संबंधित है। किसी विशेष कानून या बाध्यकारी प्रावधान के अभाव में यह निजी मेडिकल कॉलेजों में रियायती फीस का अधिकार प्रदान नहीं करता।

अदालत ने माना था कि केवल फीस अधिक होने से इसे EWS आरक्षण से वंचित किए जाने के समान नहीं माना जा सकता।

फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

पीठ ने कहा,

“हमें हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। याचिका खारिज की जाती है। कानून का प्रश्न, यदि कोई हो, खुला रखा जाता है।”

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए निजी मेडिकल कॉलेजों की मौजूदा फीस संरचना को बरकरार रखा।

Case Details:

Case Title: Harshvardhan Singh v. State of Rajasthan & Ors.

Case Number: SLP (C) No. 21751/2026

Judge: Justice B.V. Nagarathna and Justice Joymalya Bagchi

Decision Date: June 24, 2026

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