Logo

बिजली आपूर्ति बंद होने के बाद उपभोक्ताओं से बिजली संयंत्र के मूल्यह्रास शुल्क का भुगतान करने के लिए नहीं कहा जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय

Rajan Prajapati
Add Court Book as a preferred source on Google

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मार्च 2018 के बाद बंद पड़े रिठाला पावर प्लांट की लागत दिल्ली के बिजली उपभोक्ताओं से वसूल नहीं की जा सकती। - दिल्ली विद्युत नियामक आयोग बनाम टाटा पावर दिल्ली वितरण लिमिटेड

बिजली आपूर्ति बंद होने के बाद उपभोक्ताओं से बिजली संयंत्र के मूल्यह्रास शुल्क का भुगतान करने के लिए नहीं कहा जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि उपभोक्ताओं से उस बिजली संयंत्र की लागत नहीं वसूली जा सकती, जिसने मार्च 2018 के बाद बिजली आपूर्ति बंद कर दी थी। अदालत ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL) को रिठाला गैस आधारित पावर प्लांट की पूरी पूंजीगत लागत 15 वर्षों तक वसूलने की अनुमति दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद रिठाला स्थित 108 मेगावाट गैस आधारित पावर प्लांट से जुड़ा था, जिसे कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के दौरान दिल्ली में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अस्थायी रूप से स्थापित किया गया था। परियोजना को शुरू से ही केवल 5 से 6 वर्षों के संचालन के लिए मंजूरी दी गई थी।

DERC ने 31 अगस्त 2017 के आदेश में प्लांट की तकनीकी उपयोग अवधि 15 वर्ष मानी थी, लेकिन बिजली आपूर्ति और टैरिफ वसूली की अनुमति केवल मार्च 2018 तक दी थी। बाद में TPDDL ने शेष पूंजीगत लागत और उससे जुड़े खर्च की वसूली की मांग की।

APTEL ने फरवरी 2025 में कहा था कि जब नियामक आयोग ने स्वयं प्लांट की उपयोग अवधि 15 वर्ष मानी है, तो केवल 6 वर्षों तक ही मूल्यह्रास (depreciation) की अनुमति देना सही नहीं है। ट्रिब्यूनल ने DERC को निर्देश दिया था कि पूरी पूंजीगत लागत 15 वर्षों में वसूलने दी जाए।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

न्यायमूर्ति आलोक आराधे और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि टैरिफ निर्धारण केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं बल्कि उपभोक्ताओं और बिजली कंपनियों के हितों के बीच संतुलन का मामला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं से उस सेवा का शुल्क नहीं लिया जा सकता, जो उन्हें मिल ही नहीं रही थी।

पीठ ने कहा,

“उपभोक्ताओं को ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो उन्हें मार्च 2018 के बाद प्राप्त ही नहीं हुई।”

अदालत ने यह भी माना कि TPDDL के पास प्लांट को ‘मर्चेंट जनरेटर’ के रूप में चलाने या बिजली कहीं और बेचने का विकल्प उपलब्ध था। इसलिए दिल्ली के उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त टैरिफ बोझ डालना उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि DERC के 2017 के आदेश ने प्लांट के संचालन और लागत वसूली की सीमा स्पष्ट रूप से मार्च 2018 तक तय कर दी थी और TPDDL ने उस आदेश को चुनौती भी नहीं दी थी। ऐसे में बाद की कार्यवाही में उस ढांचे को बदला नहीं जा सकता।

अदालत ने APTEL का 10 फरवरी 2025 का आदेश रद्द करते हुए DERC का 11 नवंबर 2019 का आदेश बहाल कर दिया। अपील मंजूर कर ली गई और किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई गई।

Case Details

Case Title: Delhi Electricity Regulatory Commission v. Tata Power Delhi Distribution Limited

Case Number: Civil Appeal No. 6388 of 2025

Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice Alok Aradhe

Decision Date: May 7, 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates