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सुप्रीम कोर्ट ने NHAI के भूमि मुआवजे में कटौती की, कहा कि एक ही बिक्री विलेख से औद्योगिक भूमि का मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता।

Rajan Prajapati
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सुप्रीम कोर्ट ने NHAI भूमि अधिग्रहण मामले में मुआवजा घटाते हुए कहा कि अलग प्रकृति की जमीन की बिक्री दर को आधार नहीं बनाया जा सकता। - परियोजना निदेशक, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बनाम अल्फा रेमिडिस लिमिटेड और अन्य।

सुप्रीम कोर्ट ने NHAI के भूमि मुआवजे में कटौती की, कहा कि एक ही बिक्री विलेख से औद्योगिक भूमि का मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता।

भूमि अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को आंशिक राहत देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में संशोधन किया है। अदालत ने कहा कि औद्योगिक उपयोग वाली जमीन का मुआवजा तय करते समय किसी दूसरी प्रकृति की जमीन की बिक्री दर को सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला महाराष्ट्र के नागपुर जिले की एक जमीन से जुड़ा था, जिसका अधिग्रहण राष्ट्रीय राजमार्ग 547-E के फोर-लेन विस्तार परियोजना के लिए किया गया था। शुरुआत में सक्षम प्राधिकारी ने जमीन को कृषि भूमि मानते हुए लगभग ₹161.63 प्रति वर्गमीटर की दर से मुआवजा तय किया था।

हालांकि, अल्फा रेमिडिस लिमिटेड ने दावा किया कि जमीन का उपयोग औद्योगिक कार्य के लिए हो रहा था और वहां पैरासिटामोल दवा निर्माण यूनिट संचालित की जा रही थी। कंपनी ने उच्च दर पर मुआवजे की मांग करते हुए एक बिक्री विलेख और सरकारी रेडी रेकनर दर का हवाला दिया।

बाद में मध्यस्थ (Arbitrator) ने कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए मुआवजा ₹3,588 प्रति वर्गमीटर तय कर दिया।

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NHAI ने इस बढ़े हुए मुआवजे को जिला अदालत में चुनौती दी थी। जिला जज ने माना कि मध्यस्थ ने कानून के प्रावधानों का सही पालन नहीं किया और आदेश रद्द कर दिया।

लेकिन बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने मध्यस्थ का फैसला बहाल कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि जमीन कृषि नहीं बल्कि औद्योगिक उपयोग में थी, इसलिए गैर-कृषि जमीन की बिक्री दर को आधार बनाना उचित था।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 26(1) के तहत “समान प्रकार की जमीन” की बिक्री दर को ही आधार बनाया जा सकता है। अदालत ने पाया कि जिस बिक्री विलेख पर भरोसा किया गया, वह एक छोटे रिहायशी प्लॉट से जुड़ा था, जबकि विवादित जमीन औद्योगिक उपयोग में थी।

पीठ ने कहा,

“दोनों जमीनें समान प्रकृति की नहीं थीं, इसलिए उस बिक्री विलेख की दर अपनाना कानून के अनुरूप नहीं था।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल एक बिक्री विलेख के आधार पर बाजार मूल्य तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए कई बिक्री दस्तावेजों का औसत देखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सरकारी रेडी रेकनर की दर लागू होनी चाहिए थी, जो ₹2,020 प्रति वर्गमीटर थी। अदालत ने उसी दर से मुआवजा तय किया और कहा कि कंपनी को इसके साथ सभी वैधानिक लाभ भी मिलेंगे।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पहले से निकाले गए ₹50 लाख को अंतिम भुगतान में समायोजित किया जाएगा। इसके साथ ही NHAI की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Project Director, National Highways Authority of India v. Alfa Remidis Ltd. & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 33773 of 2025

Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran

Decision Date: May 12, 2026

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