Logo

मृत्यु के बाद मुकदमा करने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा लापरवाही के मामलों में कानूनी वारिस कब उत्तरदायी हो सकते हैं

Rajan Prajapati
Add Court Book as a preferred source on Google

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की मृत्यु के बाद भी मुआवज़े का दावा खत्म नहीं होता, लेकिन वारिसों की जिम्मेदारी केवल संपत्ति तक सीमित रहेगी। - कुमुद लाल बनाम सुरेश चंद्र रॉय (मृत) कानूनी वारिसों और अन्य के माध्यम से।

मृत्यु के बाद मुकदमा करने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा लापरवाही के मामलों में कानूनी वारिस कब उत्तरदायी हो सकते हैं

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि डॉक्टर की मृत्यु के बाद भी चिकित्सा संकट (चिकित्सीय लापरवाही) के मामलों में मुआवज़े की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से समाप्त नहीं होती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में डॉक्टर के कानूनी उत्तराधिकारियों को केवल अपनी छोड़ी हुई संपत्ति (एस्टेट) की सीमा तक ही भुगतान करना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कुमुद लाल बनाम सुरेश चंद्र रॉय (मृत) एवं अन्य से जुड़ा है, जिसमें एक मरीज ने डॉक्टर पर चिकित्सा लापरवाही का आरोप लगाया था। यह शिकायत पहले जिला उपभोक्ता फोरम, मुंगेर (बिहार) में दाखिल की गई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान डॉक्टर का निधन हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) में आवेदन देकर डॉक्टर के कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाने की मांग की।

NCDRC ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए वारिसों को रिकॉर्ड पर लाने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा कि यदि अंत में मुआवज़ा तय होता है, तो वारिसों को डॉक्टर की संपत्ति से ही भुगतान करना होगा।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

Read also:- दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, पुलिस की लापरवाही पर सवाल; याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत

डॉक्टर के कानूनी वारिसों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि डॉक्टर की मृत्यु के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई जारी नहीं रहनी चाहिए और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि:

“कानूनी वारिसों को केवल उस सीमा तक उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जितनी संपत्ति मृतक ने छोड़ी है। यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि संपत्ति से जुड़ी देनदारी है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को केवल इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि आरोपी व्यक्ति का निधन हो गया है।

कोर्ट ने यह साफ किया कि:

• वारिसों को अपनी जेब से भुगतान नहीं करना होगा

• केवल मृतक डॉक्टर की छोड़ी हुई संपत्ति से ही मुआवज़ा दिया जा सकता है

• केस की सुनवाई जारी रह सकती है, भले ही आरोपी की मृत्यु हो चुकी हो

इससे यह सुनिश्चित होता है कि शिकायतकर्ता को न्याय पाने का अवसर बना रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कानूनी वारिसों को मामले में पक्षकार बनाना उचित है और वे केवल संपत्ति की सीमा तक ही उत्तरदायी होंगे।

इस प्रकार, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया को जारी रखने और मुआवज़े की वसूली के लिए वारिसों को शामिल करना कानून के अनुरूप है।

Case Details

Case Title: Kumud Lall vs Suresh Chandra Roy (Dead) Through LRs & Ors.

Case Number: Civil Appeal Nos. of 2026 (arising out of SLP (C) Nos. 33646–33649 of 2018)

Judge: Justice J.K. Maheshwari and Atul S. Chandurkar

Decision Date: May 04, 2026.

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates