जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित शोध उपकरण न्यायिक कार्य में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे न्यायिक सत्यापन का विकल्प नहीं हैं। अदालत ने कहा कि AI से प्राप्त किसी भी कानूनी उद्धरण, निर्णय या कानूनी सिद्धांत का उपयोग करने से पहले उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जानी चाहिए।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने वुडलैंड हाउस स्कूल, श्रीनगर द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक पूर्व कर्मचारी को अंतरिम राहत के रूप में वेतन का भुगतान करने के निर्देश दिए गए थे।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला शकील अहमद मलिक द्वारा दायर एक सिविल वाद से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें स्कूल में सुपरवाइजर के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए थी और इस संबंध में वेतन सहित अन्य लाभ भी मांगे थे।
वाद लंबित रहने के दौरान उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 14 जून 2022 को एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए स्कूल को अप्रैल 2021 से 11 मई 2022 तक की अवधि के लिए कर्मचारी को 50 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया। साथ ही यह शर्त रखी गई कि यदि अंतिम सुनवाई में कर्मचारी का दावा असफल होता है तो वह राशि वापस करेगा।
स्कूल ने इस आदेश को पहले अपीलीय अदालत और बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन दोनों स्तरों पर उसे राहत नहीं मिली।
स्कूल प्रबंधन ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि 14 जून 2022 का आदेश केवल एक अंतरिम आदेश था, जिसे डिक्री की तरह निष्पादित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो उसके लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 2-ए के तहत कार्रवाई हो सकती है, लेकिन निष्पादन (Execution) की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती।
यह भी कहा गया कि संबंधित आदेश के खिलाफ समीक्षा याचिका लंबित है, इसलिए ट्रायल कोर्ट को आगे की कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी।
न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 36 स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करती है कि डिक्री के निष्पादन से संबंधित प्रावधान आवश्यकतानुसार न्यायालय के आदेशों पर भी लागू होंगे।
अदालत ने कहा, “विधायिका ने केवल ‘डिक्री’ नहीं बल्कि व्यापक शब्द ‘आदेश’ का प्रयोग किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कुछ न्यायिक आदेश, भले ही वे डिक्री न हों, निष्पादित किए जा सकते हैं।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए निष्पादन की कार्यवाही और अवमानना या उल्लंघन संबंधी कार्यवाही दोनों अलग-अलग कानूनी उपाय हैं।
अदालत ने कहा कि यदि किसी पक्ष को अंतरिम राहत दी गई है तो उसे केवल कागजी आदेश बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने लगातार विभिन्न मंचों पर आदेश को चुनौती देकर उसके अनुपालन में देरी करने का प्रयास किया।
अदालत ने टिप्पणी की कि संबंधित अंतरिम आदेश पहले ही ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखा जा चुका है। इसके बावजूद निष्पादन की हर प्रक्रिया को चुनौती देना न्यायिक आदेशों के प्रभाव को कमजोर करने का प्रयास प्रतीत होता है।
न्यायालय ने कहा कि जब तक किसी सक्षम अदालत द्वारा किसी आदेश को स्थगित, संशोधित या निरस्त नहीं किया जाता, तब तक उसका पालन किया जाना आवश्यक है।
फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी ध्यान दिया। अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में जिन कुछ न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया गया था, उनमें से कुछ के उद्धरण गलत थे और एक निर्णय का संदर्भ सत्यापित नहीं किया जा सका।
हालांकि इस आधार पर अदालत ने आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन उसने न्यायिक अधिकारियों को भविष्य के लिए सावधान किया।
अदालत ने कहा, “AI आधारित उपकरण कानूनी शोध में उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे न्यायिक जांच और सत्यापन का स्थान नहीं ले सकते।”
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि AI प्लेटफॉर्म से प्राप्त किसी भी कानूनी उद्धरण, निर्णय, तथ्यात्मक दावे या कानूनी सिद्धांत को न्यायिक आदेश में शामिल करने से पहले प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित किया जाना चाहिए।
साथ ही अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेशों में उद्धृत प्रत्येक निर्णय का सही और पूर्ण संदर्भ दिया जाना चाहिए तथा जहां संभव हो, निर्णयों के प्रासंगिक अंशों को यथावत उद्धृत किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्कूल की याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और 15 अक्टूबर 2025 के निष्पादन आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर 25,000 रुपये का खर्च भी लगाया और उन्हें 14 जून 2022 के अंतरिम आदेश का पालन करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो निष्पादन अदालत कानून के अनुसार उपलब्ध सभी उपायों का उपयोग कर सकती है।
Case Details
Case Title: Principal, Woodland House School & Ors. v. Shakeel Ahmad Malik
Case Number: CM(M) No. 191/2026
Judge: Justice Wasim Sadiq Nargal
Decision Date: June 6, 2026





