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न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे की अध्यक्षता में बॉम्बे हाईकोर्ट की नई पूर्ण पीठ मरेठा आरक्षण मामले की सुनवाई करेगी

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण अधिनियम, 2024 को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे की अध्यक्षता में नई पूर्ण पीठ का गठन किया है, जो 10% आरक्षण शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्रदान करता है।

न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे की अध्यक्षता में बॉम्बे हाईकोर्ट की नई पूर्ण पीठ मरेठा आरक्षण मामले की सुनवाई करेगी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग आरक्षण अधिनियम, 2024 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के लिए एक नई पूर्ण पीठ का गठन किया है। यह अधिनियम महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करता है।

नई पूर्ण पीठ का नेतृत्व न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे करेंगे, जबकि न्यायमूर्ति निजामुद्दीन जमादार और न्यायमूर्ति संदीप मर्णे इसके अन्य सदस्य होंगे। इस संबंध में अधिसूचना 15 मई 2025 को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) प्रथम द्वारा जारी की गई।

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"मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र उपाध्याय के दिल्ली हाईकोर्ट स्थानांतरण के बाद पूर्व की पूर्ण पीठ अब इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती थी, जिसके चलते न्यायमूर्ति घुगे की अध्यक्षता में नई पीठ का गठन किया गया है।"

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इससे पहले यह याचिकाएं तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र उपाध्याय, न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति फिरदौस पूनावाला की पीठ द्वारा सुनी जा रही थीं। उस पीठ ने इस मामले की काफी हद तक सुनवाई कर ली थी।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी विषय पर दायर एक याचिका को खारिज कर दिया था। यह याचिका NEET UG और NEET PG 2025 की तैयारी कर रहे छात्रों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मराठा आरक्षण को चुनौती दी गई थी। हालाँकि, प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि परीक्षा की तारीखें निकट हैं और बॉम्बे हाईकोर्ट इस पर अंतरिम राहत देने पर विचार कर सकता है।

महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग आरक्षण अधिनियम, 2024 को 20 फरवरी 2024 को विधानमंडल द्वारा पारित किया गया था और 26 फरवरी 2024 को राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया। यह अधिनियम न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुनील बी. शुकरे की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (MSBCC) की रिपोर्ट पर आधारित है।

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"इस रिपोर्ट में ‘असाधारण परिस्थितियों और विशेष स्थितियों’ का हवाला देते हुए मराठा समुदाय को आरक्षण देने की सिफारिश की गई, जिससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक हो गया।"

यह पहला मौका नहीं है जब मराठा आरक्षण का मामला अदालत में आया हो। 2018 में तत्कालीन देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 16 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक कानून पारित किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने जून 2019 में इस कानून को बरकरार रखा, लेकिन 16 प्रतिशत आरक्षण को अनुचित मानते हुए शिक्षा में 12 प्रतिशत और नौकरियों में 13 प्रतिशत कर दिया।

बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने SEBC अधिनियम, 2018 को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय को अतिरिक्त आरक्षण देने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं थी और यह 1992 के इंद्रा साहनी (मंडल) फैसले द्वारा तय 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन करता है।

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"सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मराठा समुदाय की सामाजिक पिछड़ेपन को साबित करने के लिए प्रस्तुत किए गए आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं।"

इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे अप्रैल 2023 में खारिज कर दिया गया। अब इस संबंध में एक उपचारात्मक याचिका दायर की गई है, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

अब बॉम्बे हाईकोर्ट की नई पूर्ण पीठ 2024 के इस नए कानून की वैधता पर फैसला सुनाएगी। यह सुनवाई यह तय करने में अहम होगी कि राज्य सरकार का यह नया प्रयास कानूनी कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं।

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