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DRT-स्वीकृत ऋण समझौते के बाद उधारकर्ता पर CBI की धोखाधड़ी कार्यवाही रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि DRT द्वारा अनुमोदित ऋण समझौते के वर्षों बाद शुरू की गई आपराधिक कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और चार्जशीट रद्द कर दी। - विजय कुमार केला और अन्य बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य।

DRT-स्वीकृत ऋण समझौते के बाद उधारकर्ता पर CBI की धोखाधड़ी कार्यवाही रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब किसी बैंक ऋण विवाद का निपटारा समझौते के माध्यम से हो चुका हो, उस समझौते को बैंक की सक्षम प्राधिकरण और ऋण वसूली अधिकरण (DRT) की मंजूरी भी मिल चुकी हो, तब वर्षों बाद शुरू की गई आपराधिक कार्रवाई को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने विजय कुमार केला के खिलाफ CBI द्वारा दायर चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट के आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला यूको बैंक द्वारा कृषि उत्पादों के कारोबार से जुड़ी फर्म "मोहन ट्रेडर्स" को दी गई क्रेडिट सुविधाओं से संबंधित था। वर्ष 2006 से 2009 के बीच बैंक ने फर्म को विभिन्न नकद ऋण (Cash Credit) और लेटर ऑफ क्रेडिट सुविधाएं प्रदान की थीं।

बाद में कारोबार में आई कठिनाइयों के कारण ऋण खाते का संचालन प्रभावित हुआ और उसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया। इसके बाद बैंक ने SARFAESI अधिनियम और DRT के समक्ष वसूली की कार्यवाही शुरू की।

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वर्ष 2015 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। लगभग ₹6.49 करोड़ की बकाया राशि के विरुद्ध ₹4.25 करोड़ में एकमुश्त निपटारा (One Time Settlement) स्वीकार किया गया। बैंक की सक्षम समिति ने इस समझौते को मंजूरी दी और बाद में इसे DRT के समक्ष भी प्रस्तुत किया गया।

समझौते की राशि जमा होने के बाद बैंक ने "नो ड्यूज सर्टिफिकेट" जारी कर दिया और DRT ने वसूली आवेदन को वापस लिया हुआ मानकर समाप्त कर दिया।

मामला तब नया मोड़ ले गया जब फरवरी 2018 में यूको बैंक ने CBI को शिकायत देकर आरोप लगाया कि उधारकर्ता ने कथित रूप से फर्जी ऑडिट रिपोर्टों के आधार पर ऋण सीमा बढ़वाई थी और गिरवी रखी गई संपत्तियों के स्थान पर एक अतिक्रमित भूमि को सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत किया था।

CBI ने FIR दर्ज कर जांच की और भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) तथा धारा 471 (जाली दस्तावेज को असली बताकर उपयोग करना) के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। बाद में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आरोप भी तय कर दिए।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह विवाद मूल रूप से बैंकिंग और व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा था, जिसमें नागरिक (Civil) विवाद के तत्व प्रमुख थे।

पीठ ने कहा कि बैंक ने स्वयं समझौता किया, भुगतान स्वीकार किया, नो-ड्यूज प्रमाणपत्र जारी किया और DRT के समक्ष वसूली कार्यवाही वापस ली। इसके बावजूद दो वर्ष से अधिक समय बाद आपराधिक कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं था।

अदालत ने यह भी नोट किया कि बैंक का दावा था कि उसे वर्ष 2013 में ही कथित धोखाधड़ी का संदेह हो गया था। यदि ऐसा था तो उसी समय कार्रवाई की जानी चाहिए थी। इसके बजाय बैंक ने समझौता स्वीकार किया और बाद में आपराधिक मुकदमा शुरू किया।

पीठ ने कहा:

“ऐसी आपराधिक कार्यवाही न केवल अपीलकर्ताओं के लिए दमनकारी होगी, बल्कि न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग भी होगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि DRT द्वारा अनुमोदित समझौते के बाद भी बैंकों को आपराधिक मुकदमे जारी रखने की अनुमति दी जाए, तो इससे ऐसे समझौतों की पवित्रता और विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

अदालत ने कहा कि इससे कारोबारी संस्थाएं और उधारकर्ता भविष्य में बैंकिंग विवादों को समझौते के माध्यम से सुलझाने से हिचक सकते हैं, जिसका व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने चत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 जुलाई 2024 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली।

अदालत ने CBI द्वारा 27 नवंबर 2018 को दायर चार्जशीट तथा 20 फरवरी 2023 के आरोप तय करने के आदेश को भी निरस्त कर दिया।

इसके साथ ही विजय कुमार केला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई।

Case Title: Vijay Kumar Kela & Anr. v. Central Bureau of Investigation & Anr.

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