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दूसरी शादी में मात्र मौजूद रहना या उसे न रोकना उकसावे का प्रमाण नहीं, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने द्विविवाह मामले में रिश्तेदारों की बरी को बरकरार रखा

Shivam Y.

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने द्विविवाह मामले में रिश्तेदारों की बरी होने को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि विवाह समारोह में मात्र उपस्थिति से उकसाने या सामान्य इरादे का प्रमाण नहीं मिलता। - चिंथेरला पद्मावती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य

दूसरी शादी में मात्र मौजूद रहना या उसे न रोकना उकसावे का प्रमाण नहीं, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने द्विविवाह मामले में रिश्तेदारों की बरी को बरकरार रखा
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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति की दूसरी शादी के दौरान रिश्तेदारों की मात्र उपस्थिति या शादी को न रोक पाना, अपने आप में द्विविवाह के अपराध में उनकी आपराधिक भूमिका साबित नहीं करता। इसी आधार पर अदालत ने पति के भाइयों और दूसरी पत्नी की मां को दी गई बरी को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंता ने 7 मई 2026 को दिए गए फैसले में दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति ने पहली शादी के रहते दूसरी शादी कर ली और उसे मानसिक तथा शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। वर्ष 1996 में दर्ज आपराधिक मामले में पति समेत कई रिश्तेदारों को आरोपी बनाया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने पति को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A और 494 के तहत दोषी ठहराया था। साथ ही कुछ रिश्तेदारों को भी धारा 494 सहपठित धारा 34 के तहत दोषी माना गया था। हालांकि बाद में अपीलीय अदालत ने पति के कुछ रिश्तेदारों और दूसरी पत्नी की मां को बरी कर दिया।

इसी बरी के आदेश को चुनौती देते हुए महिला हाईकोर्ट पहुंची थी।

याचिकाकर्ता की दलील

महिला की ओर से कहा गया कि पति के भाइयों और दूसरी पत्नी की मां को दूसरी शादी की पूरी जानकारी थी। आरोप था कि उन्होंने न केवल इस विवाह का समर्थन किया बल्कि इसे प्रोत्साहित भी किया।

याचिकाकर्ता ने गवाहों के बयानों और विवाह निमंत्रण पत्र का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित रिश्तेदार शादी समारोह में मौजूद थे और उन्होंने विवाह रोकने के लिए किए गए अनुरोधों को भी अनदेखा कर दिया था।

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ द्विविवाह का अपराध पहले ही साबित हो चुका है और उनकी दोषसिद्धि अंतिम रूप ले चुकी है। अब केवल यह देखना था कि क्या अन्य रिश्तेदारों ने इस विवाह के लिए उकसाया या उसमें आपराधिक सहयोग किया था।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित रिश्तेदारों ने दूसरी शादी करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

अदालत ने कहा,

“सिर्फ विवाह समारोह में सहमति देना या उपस्थित रहना यह साबित नहीं करता कि उन्होंने द्विविवाह के लिए उकसाया था।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि परिवार के बुजुर्गों से शादी रोकने का अनुरोध किया गया था और उन्होंने ऐसा नहीं किया, तब भी मात्र यह तथ्य उनके खिलाफ आपराधिक मंशा या साझा इरादा साबित नहीं करता।

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय अदालत ने आरोपियों को बरी करने के लिए पर्याप्त और उचित कारण दिए थे। अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि संबंधित रिश्तेदारों ने दूसरी शादी कराने के लिए कोई उकसावा दिया था या उनके पास ऐसा प्रभाव था जिसके बिना विवाह संभव नहीं होता।

इन निष्कर्षों के साथ अदालत ने दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया और अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए बरी के आदेश को बरकरार रखा।

Case Details:

Case Title: Chintherla Padmavathi v. State of Andhra Pradesh & Others

Case Number: Criminal Revision Case Nos. 386 and 387 of 2007

Judge: Justice Subhendu Samanta

Decision Date: May 7, 2026

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