Logo
Court Book - India Code App - Play Store

advertisement

झारखंड हाईकोर्ट: मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक के लिए ठोस प्रमाण जरूरी, पति की याचिका खारिज

Shivam Y.

झारखंड हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य अनिवार्य हैं। जानिए कोर्ट का विस्तृत फैसला।

झारखंड हाईकोर्ट: मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक के लिए ठोस प्रमाण जरूरी, पति की याचिका खारिज

झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि पति मानसिक बीमारी को तलाक का आधार बना रहा है, तो उसे इसका समर्थन करने के लिए "ठोस, विश्वसनीय और प्रमाणिक साक्ष्य" प्रस्तुत करना होगा। केवल आरोप या संदेह के आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती।

Read in English

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति राजेश कुमार की खंडपीठ ने यह फैसला एक पति की अपील पर सुनाया, जिसमें उसने अपनी पत्नी पर मानसिक विकार, क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। इससे पहले फैमिली कोर्ट, चतरा ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

"सिर्फ अस्पष्ट और सामान्य आरोपों के आधार पर मानसिक बीमारी या क्रूरता साबित नहीं होती। कानून के अनुसार, तलाक की मांग करने वाले पक्ष को इसके लिए ठोस, तथ्यात्मक और प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है," हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया।

Read also:- झारखंड उच्च न्यायालय ने पति की उच्च आय का हवाला देते हुए पत्नी और ऑटिस्टिक बेटे के लिए गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹90,000 कर दिया

पति द्वारा प्रस्तुत किए गए तीन गवाहों की गवाही में कोई मेडिकल दस्तावेज, मनोचिकित्सक की राय या उपचार का रिकॉर्ड शामिल नहीं था। कोर्ट ने माना कि पत्नी ने खुद यह स्पष्ट रूप से कहा कि वह पति के साथ अपने वैवाहिक जीवन को निभाना चाहती है और वह एक समर्पित पत्नी की तरह रहना चाहती है।

"पत्नी ने कोर्ट में कहा कि वह अपने पति को प्यार, सम्मान और सेवा देना चाहती है तथा आजीवन वैवाहिक दायित्व निभाने को तैयार है," कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा।

इसके साथ ही कोर्ट ने तलाक के अन्य आधार जैसे कि क्रूरता और परित्याग की जांच करते हुए कहा कि पति ने ऐसे किसी भी आरोप को प्रमाणित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। पत्नी की ओर से प्रस्तुत छह गवाहों ने यह प्रमाणित किया कि पत्नी मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ है और पति तथा उसके परिवार से किसी प्रकार की प्रताड़ना का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

Read also:- निर्माणाधीन फ्लैट 'साझा आवास' नहीं हो सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

"मानसिक विकार के लिए विशेषज्ञ (Psychiatrist) की रिपोर्ट, उपचार का विवरण और दीर्घकालिक व्यवहार को दर्शाने वाले प्रमाण आवश्यक हैं," कोर्ट ने कहा। इसके बिना, तलाक देने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी दोहराया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iii) के तहत तलाक तभी दिया जा सकता है जब यह साबित हो कि मानसिक बीमारी ऐसी हो जो विवाह को असहनीय बना दे।

अंततः, कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

"केवल आरोपों और संदेह के आधार पर विवाह खत्म नहीं किया जा सकता; न्यायालय ठोस और प्रामाणिक प्रमाणों के बिना तलाक नहीं दे सकता," कोर्ट ने निर्णय सुनाते हुए कहा।

मामला शीर्षक: X बनाम Y

Advertisment

Recommended Posts