मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹50,000 की लागत लगाई है। अदालत ने पाया कि महिला को पुलिस द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखने के आरोप विश्वसनीय नहीं हैं और याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला प्रतीत होती है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिका शैलेन्द्र सिंह ने दायर की थी। उनका आरोप था कि उनकी बहन और उसके परिवार के कुछ सदस्यों को महाराजपुरा थाना पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में रखा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पहले पुलिस से जवाब मांगा और महिला को अदालत में पेश करने के निर्देश दिए थे।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया कि कथित बंदी महिला अपने घर पर ही मौजूद है और अदालत आने को तैयार नहीं है। बाद में वह स्वयं अपने दो वर्षीय पुत्र के साथ अदालत में उपस्थित हुई।
महिला ने अदालत को बताया कि उसका पति हत्या के एक मामले में वांछित है और पुलिस लगातार उसकी तलाश में उनके घर आती थी। उसने दावा किया कि 10 मई और 11 मई 2026 को पुलिस उसे अपने साथ ले गई थी और किसी अज्ञात स्थान पर रखा गया था।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उसे छोड़ने के बदले उसके परिवार से ₹1 लाख की मांग की थी। उसके अनुसार, 12 मई को उसे वापस छोड़ दिया गया और तब से वह अपनी बहन के घर रह रही थी।
न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र यादव की खंडपीठ ने ने महिला और याचिकाकर्ता के बयानों की जांच के बाद कई विरोधाभासों की ओर ध्यान दिलाया। अदालत ने पाया कि महिला बार-बार पूछे जाने के बावजूद उस स्थान का नाम नहीं बता सकी, जहां कथित रूप से उसे रखा गया था।
अदालत ने यह भी नोट किया कि ₹1 लाख की मांग का आरोप मूल याचिका में कहीं दर्ज नहीं था। इसके अलावा, याचिका में सीसीटीवी फुटेज का उल्लेख होने के बावजूद कथित हिरासत की बाद की घटनाओं से संबंधित कोई फुटेज प्रस्तुत नहीं की गई।
अदालत ने कहा कि महिला द्वारा अदालत में लगाया गया ₹1 लाख की मांग का आरोप “झूठा और बाद में जोड़ी गई कहानी” प्रतीत होता है।
खंडपीठ ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि महिला को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में लिया था। अदालत ने माना कि याचिका का उद्देश्य पुलिस पर दबाव बनाना प्रतीत होता है ताकि वह महिला के पति, जो हत्या के मामले में फरार बताया गया है, की तलाश बंद कर दे।
पीठ ने टिप्पणी की, “यह याचिका न्यायालय की वैध शक्तियों के दुरुपयोग का मामला प्रतीत होती है।”
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को एक माह के भीतर ₹50,000 की लागत जमा करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि राशि जमा न करने पर वसूली की कार्यवाही के साथ अवमानना की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।
Case Details:
Case Title: Shailendra Singh v. State of Madhya Pradesh and Others
Case Number: Writ Petition No. 17776 of 2026
Judges: Justice G. S. Ahluwalia and Justice Pushpendra Yadav
Decision Date: 14 May 2026





