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सुप्रीम कोर्ट ने 1995 की प्रोबेट मंजूरी बहाल की, कहा- नोटिस की अनदेखी करने वाले बाद में जानकारी न होने का दावा नहीं कर सकते

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में दिए गए प्रोबेट को बहाल करते हुए कहा कि अदालत के नोटिस मिलने के बाद भी कार्रवाई न करने वाले पक्ष बाद में जानकारी न होने का दावा नहीं कर सकते। - धीरज दत्ता बनाम अनिर्बान सेन और अन्य।

सुप्रीम कोर्ट ने 1995 की प्रोबेट मंजूरी बहाल की, कहा- नोटिस की अनदेखी करने वाले बाद में जानकारी न होने का दावा नहीं कर सकते

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अदालत से भेजे गए नोटिसों की अनदेखी करने वाला पक्ष वर्षों बाद यह दावा नहीं कर सकता कि उसे मामले की जानकारी नहीं थी। अदालत ने लगभग 27 वर्ष बाद दायर की गई प्रोबेट रद्द करने की याचिका को समय-सीमा से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया और 1995 में दिए गए प्रोबेट को बहाल कर दिया।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने धीरज दत्ता की अपील स्वीकार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत गौरिप्रोवा सेन की संपत्तियों से हुई। उनके पति अमूल्य चंद्र सेन के निधन के बाद वे उनकी एकमात्र कानूनी उत्तराधिकारी बनीं। बाद में उन्होंने अपनी कुछ संपत्ति अपने भतीजे धीरज दत्ता को उपहार स्वरूप भी दी थी।

9 जुलाई 1989 को गौरिप्रोवा सेन ने एक वसीयत (Will) बनाई, जिसमें धीरज दत्ता को एकमात्र निष्पादक (Executor) और लाभार्थी नियुक्त किया गया। उनके निधन के बाद धीरज दत्ता ने प्रोबेट के लिए आवेदन किया, जिसे 28 सितंबर 1995 को मंजूरी मिल गई।

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इसके बाद राजस्व अभिलेखों में आवश्यक परिवर्तन कराने के लिए कार्यवाही शुरू हुई। धीरज दत्ता का कहना था कि 2013 में चल रही म्यूटेशन कार्यवाही के दौरान प्रतिवादियों के पूर्वजों को नोटिस भेजे गए थे। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने दावा किया कि उन्हें प्रोबेट के बारे में पहली बार 2019 में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने संपत्ति संबंधी दीवानी मुकदमा दायर किया और वर्ष 2022 में प्रोबेट रद्द करने की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया।

कलकत्ता हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने जून 2023 में प्रोबेट रद्द करने की याचिका को समय-सीमा (Limitation) से बाहर बताते हुए खारिज कर दिया था।

हालांकि, बाद में डिवीजन बेंच ने इस आदेश को पलट दिया और याचिका पर सुनवाई की अनुमति दे दी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए धीरज दत्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) में प्रोबेट रद्द करने के आवेदन के लिए कोई विशेष समय-सीमा निर्धारित नहीं है। ऐसे मामलों में सीमा अधिनियम, 1963 की अनुच्छेद 137 लागू होती है, जिसके तहत आवेदन करने का अधिकार उत्पन्न होने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर याचिका दायर करनी होती है।

अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या प्रतिवादियों को वास्तव में 2019 में प्रोबेट की जानकारी मिली थी, या उन्हें इससे पहले ही जानकारी मान ली जानी चाहिए थी।

पीठ ने पाया कि प्रतिवादियों ने स्वयं स्वीकार किया था कि उन्हें 2013 में म्यूटेशन कार्यवाही से संबंधित नोटिस मिले थे। इसके बावजूद उन्होंने उस कार्यवाही में भाग नहीं लिया और मामले की पड़ताल करने का कोई प्रयास नहीं किया।

पीठ ने कहा,

“यदि किसी व्यक्ति को अदालत की ओर से नोटिस प्राप्त होता है, तो कम से कम उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह यह जानने का प्रयास करे कि नोटिस क्यों भेजा गया है और उसे क्या कदम उठाने चाहिए।”

अदालत ने कहा कि एक समझदार और सतर्क व्यक्ति ऐसी स्थिति में मामले की जड़ तक पहुंचने का प्रयास करता। खासकर तब, जब संपत्ति पर अधिकार का प्रश्न जुड़ा हो और कोई तीसरा व्यक्ति उसी संपत्ति के संबंध में कार्यवाही शुरू कर चुका हो।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 2013 में प्राप्त नोटिस प्रतिवादियों के लिए “रचनात्मक सूचना” (Constructive Notice) के समान थे। यदि उन्होंने उचित सावधानी बरती होती, तो वे उसी समय यह जान सकते थे कि म्यूटेशन कार्यवाही का आधार धीरज दत्ता के पक्ष में दिया गया प्रोबेट था।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में 2022 में दायर किया गया प्रोबेट रद्द करने का आवेदन स्पष्ट रूप से समय-सीमा से बाहर था।

पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादियों की याचिका “पूरी तरह समय-सीमा से बाधित” थी। इसलिए डिवीजन बेंच का फैसला रद्द किया जाता है और एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को बहाल किया जाता है।

इसके साथ ही अपील स्वीकार कर ली गई और लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।

Case Details:

Case Title: Dhiraj Dutta v. Anirban Sen & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 3371 of 2026

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Vipul M. Pancholi

Decision Date: May 29, 2026

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