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मद्रास उच्च न्यायालय ने 30 वर्षों के अलगाव के बाद तलाक को बरकरार रखा, कहा कि पति के खिलाफ बार-बार लगाए गए आरोप मानसिक क्रूरता के बराबर थे।

Shivam Y.

मद्रास हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के 30 वर्षों से अधिक समय तक अलग रहने, पति पर लगातार आरोप लगाने और सेना के अधिकारियों को शिकायत भेजने को मानसिक क्रूरता मानते हुए तलाक का आदेश बरकरार रखा।

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मद्रास उच्च न्यायालय ने 30 वर्षों के अलगाव के बाद तलाक को बरकरार रखा, कहा कि पति के खिलाफ बार-बार लगाए गए आरोप मानसिक क्रूरता के बराबर थे।
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मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक सेवानिवृत्त सेना कर्मी को दिया गया तलाक का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि पत्नी द्वारा पति पर अन्य महिलाओं से संबंध रखने के आरोप लगाना, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायतें भेजना और तीन दशक से अधिक समय तक अलग रहना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।

न्यायमूर्ति पी. वदामलाई ने पत्नी की दूसरी अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों द्वारा पारित तलाक के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

पति और पत्नी का विवाह वर्ष 1977 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उनके दो बच्चे हैं। पति का आरोप था कि विवाह के शुरुआती वर्षों से ही पत्नी उस पर अन्य महिलाओं से संबंध रखने का संदेह करती थी और इस कारण अक्सर विवाद करती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने सेना में उसकी सेवा के दौरान उसके वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायतें भेजीं, जिससे उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।

पति ने अदालत को बताया कि समय के साथ दोनों के बीच कई आपराधिक और दीवानी मुकदमे भी चले। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया, जिससे उसे मानसिक पीड़ा हुई।

वहीं पत्नी ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि उसने जो भी शिकायतें कीं, वे पति के व्यवहार के कारण थीं। उसने पति पर अन्य महिलाओं से संबंध रखने और उसके साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप लगाए तथा धर्म परिवर्तन के आरोप को भी नकार दिया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी ने अपने साक्ष्य में स्वीकार किया था कि उसने पति के कथित संबंधों की शिकायत सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से की थी। अदालत ने इस स्वीकारोक्ति को महत्वपूर्ण माना।

कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की नौकरी, प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान पर असर डालने वाली ऐसी शिकायतें मानसिक क्रूरता का आधार बन सकती हैं।

पीठ ने कहा,

“जब किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके सहकर्मियों, वरिष्ठ अधिकारियों और समाज के बीच प्रभावित होती है, तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह ऐसे व्यवहार को नजरअंदाज कर वैवाहिक संबंध बनाए रखे।”

अदालत ने पत्नी के उस बयान पर भी ध्यान दिया जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह ‘थाली’ (मंगलसूत्र) नहीं पहनती है। हाईकोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि दक्षिण भारत में थाली विवाह संबंध का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है और उसका हटाया जाना कुछ परिस्थितियों में मानसिक क्रूरता का संकेत हो सकता है।

कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि पत्नी के धर्म परिवर्तन संबंधी आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

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पत्नी की ओर से तर्क दिया गया कि "वैवाहिक संबंध का पूर्ण रूप से टूट जाना" (Irretrievable Breakdown of Marriage) हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का वैधानिक आधार नहीं है और केवल सुप्रीम कोर्ट ही संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत इस आधार पर विवाह समाप्त कर सकता है।

हाईकोर्ट ने माना कि केवल वैवाहिक संबंध टूट जाने को तलाक का स्वतंत्र आधार नहीं माना जा सकता, लेकिन लंबे समय तक अलग रहना मानसिक क्रूरता का आकलन करते समय एक महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है।

कोर्ट ने पाया कि पति-पत्नी वर्ष 1996 के आसपास से अलग रह रहे हैं और 30 वर्षों से अधिक समय से उनके बीच कोई वैवाहिक सहजीवन नहीं है। अदालत ने यह भी नोट किया कि पत्नी ने पुनर्मिलन के लिए वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना संबंधी कोई कार्यवाही शुरू नहीं की।

न्यायालय ने कहा कि इतनी लंबी अवधि तक अलगाव और संबंधों का पूरी तरह समाप्त हो जाना भी मानसिक क्रूरता की स्थिति को दर्शाता है।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पति मानसिक क्रूरता का आधार साबित करने में सफल रहा है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।

इसके साथ ही न्यायमूर्ति वदामलाई ने पत्नी की दूसरी अपील खारिज कर दी और पति के पक्ष में पारित तलाक के आदेश को बरकरार रखा।

Case Details:

Case Title: V vs. C

Case Number: C.M.S.A.(MD) No. 44 of 2021

Judge: Justice P. Vadamalai

Decision Date: 01 June 2026

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