मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में, यौन उत्पीड़न के आरोपी एक व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा है। उस पर बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत 13 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने का आरोप था, जबकि पीड़िता और उसके परिवार ने मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष का समर्थन करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने पाया कि डीएनए साक्ष्य सजा को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त मजबूत थे, और मूल आजीवन कारावास की सजा को संशोधित करते हुए कम से कम 20 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
बात जनवरी 2020 की है। थेनी जिले के बोडिनायकनूर इलाके में मुरुगन पर आरोप था कि उसने एक 13 साल की लड़की को एक पड़ोसी के घर बुलाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। इतना ही नहीं, उसने कथित रूप से पीड़िता को धमकी भी दी कि किसी को कुछ न बताए। फरवरी 2020 में दोबारा धमकी देने का भी आरोप था।
पीड़िता की मां ने शिकायत दर्ज कराई और क्राइम नंबर 125/2020 के तहत FIR दर्ज हुई - POCSO की धारा 5(l) सहित धारा 6 और IPC की धारा 506(1) के तहत। उसी दिन आरोपी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया।
स्कूल प्रमाण पत्र से पता चला कि पीड़िता की जन्मतिथि 29 मई 2006 है, यानी घटना के वक्त वह महज 13 साल की थी। मेडिकल जांच में पता चला कि वह पांच हफ्ते की गर्भवती है।
जब थेनी की फास्ट ट्रैक महिला अदालत में सुनवाई शुरू हुई, तो कुछ ऐसा हुआ जो ऐसे मामलों में अक्सर देखा जाता है - पीड़िता (PW3) और उसके माता-पिता (PW1 और PW2) सभी अदालत में पलट गए। उन्होंने अभियोजन पक्ष का साथ देने से इनकार कर दिया। पीड़िता ने तो यहां तक कह दिया कि बच्चे का जन्म ही नहीं हुआ।
ऐसे में अभियोजन पक्ष के पास बचा क्या? DNA रिपोर्ट।
दरअसल, पीड़िता का बच्चा 24 अक्टूबर 2020 को पैदा हुआ - उस वक्त तक पुलिस अपनी फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर चुकी थी। इसलिए चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने दिसंबर 2020 में जांच अधिकारी को पत्र लिखा और DNA जांच की मांग की। जनवरी-फरवरी 2021 में आरोपी, पीड़िता और बच्चे के खून के नमूने सरकारी अस्पताल से लिए गए। नमूने मदुरई की फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) भेजे गए। अगस्त 2021 में आई DNA रिपोर्ट ने साफ कर दिया - मुरुगन उस बच्चे का जैविक पिता है।
ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी माना और उम्रकैद की सजा सुनाई।
मुरुगन के वकील ने कई आधारों पर सजा को चुनौती दी। मुख्य तर्क यह था कि न पीड़िता ने, न उसके परिवार ने अभियोजन का साथ दिया - ऐसे में सिर्फ DNA रिपोर्ट के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। इसके अलावा तर्क दिया कि नमूनों की कस्टडी की कोई पक्की कड़ी नहीं थी, DNA दस्तावेज रिपोर्ट बनाने वाले विशेषज्ञ के बजाय जांच अधिकारी के जरिए पेश किए गए, और CrPC की धारा 207 के तहत आरोपी को इन दस्तावेजों की प्रतियां नहीं दी गईं।
राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने इन सभी दलीलों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी ने नमूने लेने की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से बताई थी और बचाव पक्ष ने जिरह में एक भी सवाल नहीं उठाया। दस्तावेज न मिलने की बात भी गलत है - क्योंकि आरोपी के वकील ने FSL के डिप्टी डायरेक्टर (PW13) से उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर जिरह की थी।
पीठ ने पूरी घटनाओं की टाइमलाइन गौर से देखी।
नमूनों की कस्टडी के बारे में अदालत ने कहा कि खून के नमूने सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, थेनी से लिए गए और महज छह दिनों के भीतर FSL मदुरई पहुंचा दिए गए। पूरी प्रक्रिया अदालत की निगरानी में हुई। कहीं कोई छेड़छाड़ का सवाल ही नहीं था।
दस्तावेज न मिलने की दलील पर अदालत ने दो टूक कहा - "यह तथ्य कि आरोपी को संबंधित दस्तावेज दिए गए थे, इसी से स्पष्ट होता है कि आरोपी ने PW13 यानी FSL मदुरई के डिप्टी डायरेक्टर से उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सवाल पूछे।"
बचाव पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के करनदीप शर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के फैसले का हवाला दिया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने उसे लागू करने से इनकार कर दिया। उस मामले में पीड़ित बच्चे का शव मिला था, बाल के नमूने बिना सील किए FSL भेजे गए थे और पूरा ट्रायल जल्दबाजी में हुआ था - यहां ऐसी कोई बात नहीं थी।
पीड़िता के धारा 164 CrPC के बयान पर अदालत ने कहा कि चूंकि उसने यह नहीं कहा कि बयान दबाव में दिया था और दस्तखत उसके हैं - इसलिए वह बयान पुष्टि के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया और दो अहम बदलाव किए।
पहला बदलाव - धारा में संशोधन: मूल आरोप POCSO की धारा 5(l) के तहत था, जो तब लागू होती है जब यौन उत्पीड़न एक से अधिक बार या बार-बार किया गया हो। चूंकि पीड़िता ने अदालत में बयान का समर्थन नहीं किया, इसलिए बार-बार उत्पीड़न साबित नहीं हो सका। अदालत ने धारा को बदलकर 5(j)(ii) कर दिया - जिसकी सजा समान ही है।
दूसरा बदलाव - सजा में संशोधन: पीड़िता और उसके परिवार के पलट जाने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उम्रकैद को बदलकर कम से कम 20 साल की कठोर कारावास कर दिया।
IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोष सिद्धि रद्द कर दी गई, क्योंकि पीड़िता के पलटने से यह आरोप टिक नहीं सका।
Case Details:
Case Title: Murugan v. State of Tamil Nadu
Case Number: Crl. A(MD) No. 1034 of 2023
Bench: Justice N. Anand Venkatesh and Justice K.K. Ramakrishnan
Decision Date: June 5, 2026





