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POCSO मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया, उम्र साबित करने के मूल दस्तावेज पेश न होने पर सजा रद्द

Vivek G.
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महेश बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया राज्य, मद्रास हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी को बरी किया। अदालत ने कहा कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए मूल दस्तावेज पेश नहीं किए गए।

POCSO मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया, उम्र साबित करने के मूल दस्तावेज पेश न होने पर सजा रद्द

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए युवक को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए मूल दस्तावेज पेश नहीं कर सका। केवल फोटोकॉपी के आधार पर उम्र तय करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया गया।

यह फैसला न्यायमूर्ति एन. माला ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता की उम्र घटना के समय लगभग 16 वर्ष थी। आरोपी, जो पीड़िता के बड़े भाई का मित्र था, उससे परिचित हो गया था।

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3 मार्च 2018 को आरोपी ने फोन पर पीड़िता से अपने प्रेम का इजहार किया और उससे विवाह करने की इच्छा जताई। अगले दिन सुबह पीड़िता घर से निकल गई और आरोपी के साथ उसके रिश्तेदार के घर चली गई, जहां दोनों ने विवाह कर लिया।

आरोप था कि विवाह के बाद आरोपी ने उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। बाद में 5 अप्रैल 2018 को चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर सूचना मिलने के बाद अधिकारियों ने दोनों को बरामद किया और महिला पुलिस स्टेशन को सौंप दिया। इसके बाद POCSO एक्ट और आईपीसी की धारा 366 के तहत मामला दर्ज हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास सहित सजा सुनाई थी।

अपील में क्या दलीलें दी गईं

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध था और पीड़िता स्वयं उसके साथ गई थी।

वकील ने यह भी कहा कि पीड़िता के बयान समय-समय पर बदलते रहे और उनमें विरोधाभास था। ऐसे में केवल उन्हीं बयानों के आधार पर दोषसिद्धि उचित नहीं है।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही आकलन किया और मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन के पक्ष में थे।

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अदालत की प्रमुख टिप्पणी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए पाया कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए जो जन्म प्रमाणपत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट पेश किए गए, वे केवल फोटोकॉपी थे।

अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार प्राथमिक साक्ष्य (मूल दस्तावेज) ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और केवल अपवाद स्थितियों में ही द्वितीयक साक्ष्य (जैसे फोटोकॉपी) स्वीकार किए जा सकते हैं।

पीठ ने कहा:

“प्राथमिक साक्ष्य ही नियम है और द्वितीयक साक्ष्य अपवाद। जब मूल दस्तावेज उपलब्ध थे, तब उनकी जगह केवल फोटोकॉपी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने पाया कि अभियोजन यह नहीं बता पाया कि मूल दस्तावेज क्यों पेश नहीं किए गए।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की उम्र साबित करना POCSO मामले में आधारभूत तथ्य होता है।

जब उम्र साबित करने वाले दस्तावेज ही स्वीकार्य नहीं हैं, तो अभियोजन का पूरा मामला कमजोर हो जाता है।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा फोटोकॉपी दस्तावेजों पर भरोसा करने को “गंभीर त्रुटि” बताया और कहा कि यदि इन दस्तावेजों को हटाया जाए तो अभियोजन का मामला टिकता नहीं है।

इसी आधार पर अदालत ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही आदेश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

Case Title: Mahesh vs State represented by Inspector of Police

Case No.: Crl.A.(MD) No.1300 of 2025

Decision Date: 16 February 2026

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