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पत्नी पर पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का पति का दबाव दहेज की मांग के बराबर हो सकता है: कलकत्ता हाई कोर्ट

Zaved Khan
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने दहेज मृत्यु मामले में पति की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी उम्रकैद 10 वर्ष कर दी, जबकि साक्ष्यों के अभाव में सास-ससुर को बरी कर दिया। - Sajal Parui v. The State of West Bengal

पत्नी पर पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का पति का दबाव दहेज की मांग के बराबर हो सकता है: कलकत्ता हाई कोर्ट

कलकत्ता हाई कोर्ट ने वर्ष 2014 के दहेज मृत्यु मामले में पति और उसके माता-पिता द्वारा दायर अपीलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उसकी उम्रकैद की सजा घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी। वहीं, अदालत ने पाया कि सास-ससुर के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

चयनिका की शादी 24 अप्रैल 2010 को साजल पारुई से हुई थी। अभियोजन के अनुसार, विवाह के बाद उससे लगातार अधिक धन लाने का दबाव बनाया गया और उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। आरोप था कि पति के दबाव में वह अपने भाई से पैतृक संपत्ति बेचकर उसमें मिलने वाला हिस्सा दिलाने की मांग करती थी।

23 जून 2014 को चयनिका और उसकी नाबालिग बेटी अपने ससुराल में मृत अवस्था में फंदे से लटकी मिलीं। इसके बाद चयनिका के भाई की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 498ए, 302, 304बी और 34 के तहत मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया और ट्रायल कोर्ट ने हत्या के आरोप से आरोपियों को बरी करते हुए पति और उसके माता-पिता को दहेज उत्पीड़न तथा दहेज मृत्यु का दोषी ठहराया था। पति को उम्रकैद और माता-पिता को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई थी।

अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि एफआईआर दर्ज कराने में दो दिन की देरी हुई, जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा होता है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मृतका द्वारा लिखा गया आत्महत्या पत्र (सुसाइड नोट) पति और उसके परिवार को जिम्मेदार नहीं ठहराता था तथा हस्तलेखन विशेषज्ञ ने भी उस नोट को मृतका का ही लिखा हुआ बताया था।

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राज्य सरकार ने दलील दी कि दहेज की मांग केवल नकद या सामान तक सीमित नहीं होती। यदि किसी महिला पर अपने मायके से संपत्ति या धन लाने के लिए लगातार दबाव बनाया जाए, तो वह भी दहेज मांग की श्रेणी में आ सकता है।

हाई कोर्ट की टिप्पणी

खंडपीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही था कि चयनिका की मृत्यु आत्महत्या से हुई और उसकी नाबालिग बेटी की मृत्यु उसकी मां के हाथों हुई थी।

एफआईआर में हुई देरी पर अदालत ने कहा कि बहन और उसकी बच्ची की अचानक मृत्यु जैसी घटना से परिवार के लोग स्तब्ध हो सकते हैं और ऐसी स्थिति में कानूनी सलाह लेकर शिकायत दर्ज कराना स्वाभाविक है।

अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि साजल पारुई लगातार मृतका पर अपने पैतृक संपत्ति के हिस्से की राशि लाने का दबाव बना रहा था। अदालत ने कहा कि किसी महिला का अपने पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना उसका वैधानिक अधिकार है, लेकिन यदि यह मांग पति के दबाव का परिणाम हो, तो उसे दहेज मांग के व्यापक अर्थ में देखा जा सकता है।

पीठ ने कहा,

"सुसाइड नोट से स्पष्ट संकेत मिलता है कि यदि मृतका पैसे की व्यवस्था नहीं कर पाती, तो साजल पारुई दूसरी शादी कर सकता था।"

हालांकि, अदालत ने सास-ससुर के संबंध में अलग निष्कर्ष निकाला। न्यायालय ने कहा कि एफआईआर में उनके खिलाफ आरोप जरूर लगाए गए थे, लेकिन मुकदमे के दौरान ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने दहेज की मांग या उत्पीड़न में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

पीठ ने कहा,

"हरेंद्र चंद्र पारुई और रीना पारुई के विरुद्ध ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर उनकी दोषसिद्धि को कायम रखा जा सके।"

अदालत का फैसला

हाई कोर्ट ने साजल पारुई की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि दहेज मृत्यु के प्रत्येक मामले में उम्रकैद देना आवश्यक नहीं है। इसलिए उसकी सजा को उम्रकैद से घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया गया, जबकि जुर्माने की सजा यथावत रखी गई।

साथ ही, अदालत ने हरेंद्र चंद्र पारुई और रीना पारुई के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया और उनके जमानत बंधपत्र भी समाप्त करने का निर्देश दिया।

Case Details:

Case Title: Sajal Parui v. The State of West Bengal

Case Number: CRA (DB) 183 of 2024 (with CRA 538 of 2017)

Judge: Justice Arijit Banerjee and Justice Apurba Sinha Ray

Decision Date: 2 July 2026

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