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एक ही शहर में रहना ‘घरेलू हस्तक्षेप’ साबित नहीं करता: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ननद-बहनोई को दी राहत

Shivam
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि अलग रह रहे रिश्तेदारों पर केवल सामान्य आरोप लगाकर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। - मोनिजा फारूकी और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य।

एक ही शहर में रहना ‘घरेलू हस्तक्षेप’ साबित नहीं करता: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ननद-बहनोई को दी राहत

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शादीशुदा ननद और उसके पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि केवल पारिवारिक रिश्ते के आधार पर दूर रह रहे रिश्तेदारों को मुकदमे में शामिल नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उनके खिलाफ कोई ठोस और विशिष्ट आरोप मौजूद न हों।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक महिला द्वारा अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ दायर की गई शिकायत से उत्पन्न हुआ है, जिसमें उसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 406 के तहत क्रूरता, दहेज उत्पीड़न और आपराधिक विश्वासघात के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम के प्रावधानों का आरोप लगाया है।

शिकायतकर्ता महिला की शादी अक्टूबर 2022 में हुई थी। FIR के अनुसार, शादी के कुछ महीनों बाद पति और ससुराल पक्ष द्वारा ₹3 लाख की मांग की गई। महिला ने आरोप लगाया कि उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिसके बाद वह अप्रैल 2023 में वैवाहिक घर छोड़कर चली गई।

करीब छह महीने बाद, अक्टूबर 2023 में FIR दर्ज कराई गई। इस शिकायत में पति के साथ-साथ उसकी शादीशुदा बहन और बहनोई को भी आरोपी बनाया गया। उन पर आरोप था कि वे पति को “उकसाते” थे और घर आकर प्रताड़ना में सहयोग करते थे।

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हालांकि, अदालत के सामने रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि दोनों याचिकाकर्ता 2014 से अलग घर में रह रहे थे। उनका निवास स्थान भी वैवाहिक घर से अलग था और वे अपने बच्चों व पेशेवर जीवन के साथ स्वतंत्र परिवार चला रहे थे।

न्यायमूर्ति उदय कुमार ने कहा कि FIR और केस डायरी में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई विशेष घटना, तारीख या प्रत्यक्ष भूमिका नहीं बताई गई है। अदालत ने पाया कि “instigation” यानी उकसाने का आरोप केवल सामान्य शब्दों में लगाया गया था।

फैसले में अदालत ने कहा,

“दूर रह रहे रिश्तेदारों के खिलाफ केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान में खुद कहा था कि उसके गहने ससुर के पास रखे गए थे। ऐसे में ननद और उसके पति के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात (Section 406 IPC) का मामला प्रथम दृष्टया नहीं बनता।

अदालत ने FIR दर्ज कराने में छह महीने की देरी को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि इस अवधि में शिकायतकर्ता की ओर से कोई सामान्य डायरी, महिला प्रकोष्ठ शिकायत या अन्य तत्काल कदम नहीं उठाया गया।

जस्टिस उदय कुमार ने कहा कि इस प्रकार की देरी और सामान्य आरोप यह संकेत देते हैं कि बाद में रिश्तेदारों को मुकदमे में शामिल किया गया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में दूर के रिश्तेदारों को “rope in” करने की प्रवृत्ति को सावधानी से देखना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने अंततः शादीशुदा ननद मोनिज़ा फारूकी और उनके पति शारिक हुसैन के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ मुकदमा जारी रखने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री मौजूद नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति और सास-ससुर के खिलाफ ट्रायल कानून के अनुसार जारी रहेगा और इस आदेश का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Case Details

Case Title: Moniza Farooquee & Anr. vs State of West Bengal & Anr.

Case Number: CRR 619 of 2025

Judge: Justice Uday Kumar

Decision Date: April 28, 2026

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