जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) की धारा 12 के तहत दायर की गई शिकायतों को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की समय सीमा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि समय सीमा केवल संरक्षण आदेश के उल्लंघन से जुड़ी दंडात्मक कार्यवाही पर लागू होती है, न कि घरेलू हिंसा की मूल शिकायतों पर।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला तिलक राज की याचिका पर आया, जिन्होंने अपनी पत्नी दर्शना देवी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। दर्शना देवी ने 2019 में मारपीट, घर से निकालने और दहेज मांगने के आरोप लगाए थे और 2022 में मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दायर की। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि घटना के दो साल बाद शिकायत दाखिल की गई, इसलिए यह CrPC की धारा 468 के तहत समय barred है।
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न्यायमूर्ति एम. ए. चौधरी ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि DV Act महिलाओं को पारिवारिक हिंसा से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 12 के तहत आवेदन सिविल प्रकृति का होता है और इसे CrPC की धारा 200 के तहत दर्ज आपराधिक शिकायत के बराबर नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
"CrPC की धारा 468 के तहत समय सीमा का प्रतिबंध केवल DV Act की धारा 31 में संरक्षण आदेश के उल्लंघन से जुड़ी दंडात्मक कार्यवाही पर लागू होगा, धारा 12 या धारा 23 के तहत दायर आवेदनों पर नहीं।" इस निष्कर्ष को अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले कमाची बनाम लक्ष्मी नारायण से भी पुष्ट किया।
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अदालत ने शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल (2025) का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 482 CrPC के तहत DV Act की कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिकाएं स्वीकार्य हैं, लेकिन हाई कोर्ट को ऐसे अधिकारों का उपयोग केवल गंभीर गैरकानूनी या अन्यायपूर्ण मामलों में ही करना चाहिए।
इस व्याख्या के साथ हाई कोर्ट ने तिलक राज की याचिका को "भ्रामक और निरर्थक" बताते हुए खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट को दर्शना देवी की शिकायत पर शीघ्र सुनवाई करने का निर्देश दिया गया है।
केस का शीर्षक: तिलक राज बनाम दर्शना देवी
केस नंबर: सीआरएम(एम) नंबर 864/2023