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आपसी सहमति से तलाक में 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि जरूरी नहीं, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया

Shivam Y.

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक के मामलों में छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि अनिवार्य नहीं है और उचित परिस्थितियों में इसे माफ किया जा सकता है।

आपसी सहमति से तलाक में 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि जरूरी नहीं, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया
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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें छह महीने की वैधानिक प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग-ऑफ पीरियड) पूरी होने से पहले मामले की सुनवाई आगे बढ़ाने से इनकार किया गया था।

न्यायमूर्ति वेंकटेश्वरलु निम्मागड्डा ने कहा कि जब पति-पत्नी अपने सभी विवाद सुलझा चुके हों और पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो, तब प्रतीक्षा अवधि पर जोर देना कानून के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पति-पत्नी का विवाह 4 दिसंबर 2022 को हुआ था और उनके एक पुत्री भी है। वैवाहिक विवादों के कारण दोनों लगभग एक वर्ष से अलग रह रहे थे। इसके बाद उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-B के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की।

याचिका लंबित रहने के दौरान दोनों पक्षों ने अदालत को बताया कि उन्होंने आपस के सभी विवाद सुलझा लिए हैं। समझौते के अनुसार पति ने पत्नी और नाबालिग पुत्री के हित में 62 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण के रूप में देने तथा कुछ संपत्तियां उनके पक्ष में रखने पर सहमति जताई। वहीं पत्नी ने पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने का निर्णय लिया।

इसके बाद दोनों ने तलाक याचिका की जल्द सुनवाई के लिए आवेदन दायर किया, लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि छह महीने की अवधि पक्षकारों को अपने फैसले पर पुनर्विचार और सुलह का अवसर देने के लिए आवश्यक है।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि विवाह समाप्त करने के निर्णय पर दोनों पक्ष पूरी तरह सहमत हैं और उनके बीच संपत्ति, भरण-पोषण, बच्चे की देखभाल तथा अन्य सभी मुद्दों का समाधान हो चुका है। ऐसे में प्रतीक्षा अवधि बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि समझौता स्वैच्छिक और वास्तविक प्रतीत होता है तथा दोनों पक्ष विवाह संबंध समाप्त करने के निर्णय पर स्पष्ट हैं।

न्यायालय ने कहा,

धारा 13-B(2) का उद्देश्य पक्षकारों को अपने निर्णय पर पुनर्विचार और पुनर्मिलन की संभावना तलाशने का अवसर देना है। लेकिन जब सभी विवाद सुलझ चुके हों और साथ रहने की कोई संभावना न हो, तब प्रतीक्षा अवधि केवल उनकी कठिनाइयों को बढ़ाती है।”

अदालत ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर और अमित कुमार बनाम सुमन बेनीवाल मामलों में स्पष्ट किया जा चुका है कि यह अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक (directory) है और उपयुक्त मामलों में इसे माफ किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट, प्रकाशम जिला, ओंगोल द्वारा 12 अप्रैल 2026 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

साथ ही फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह मामले को शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करे और आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की याचिका पर कानून के अनुसार यथाशीघ्र उचित आदेश पारित करे। लंबित अन्य आवेदनों को भी बंद करने का निर्देश दिया गया।

Case Details

Case Title: X and Y

Case Number: Civil Revision Petition No. 1405 of 2026

Judge: Justice Venkateswarlu Nimmagadda

Decision Date: 04 May 2026

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