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सुप्रीम कोर्ट ने विवाहित बेटियों के उचित मूल्य पर दुकान में भूखंड आवंटित करने के अधिकार को बरकरार रखा, लैंगिक भेदभाव को समाप्त किया।

CB News Desk

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटी को उचित दर की दुकान के आवंटन से वंचित नहीं किया जा सकता। निर्भरता और पात्रता ही मुख्य आधार होंगे। - कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य। एवं अन्य

सुप्रीम कोर्ट ने विवाहित बेटियों के उचित मूल्य पर दुकान में भूखंड आवंटित करने के अधिकार को बरकरार रखा, लैंगिक भेदभाव को समाप्त किया।
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सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के समान अधिकारों को मजबूत करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को मृत उचित दर (फेयर प्राइस शॉप) विक्रेता के आश्रित के रूप में राशन दुकान के आवंटन से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कुलसुम निशा की अपील स्वीकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अमेठी जिले के एक गांव में कुलसुम निशा की मां बदरून निशा उचित दर की दुकान संचालित करती थीं। मार्च 2024 में उनके निधन के बाद कुलसुम निशा ने आश्रित कोटे के तहत दुकान आवंटित करने का आवेदन दिया।

हालांकि, उपजिलाधिकारी (SDM) ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा बेटी हैं और सरकारी आदेश के अनुसार "परिवार" की परिभाषा में शामिल नहीं हैं। बाद में डिप्टी कमिश्नर ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।

इसके बाद कुलसुम निशा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि यह प्रश्न व्यापक कानूनी महत्व का है और मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का रास्ता दिया।

अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि किसी महिला को केवल विवाह के आधार पर लाभकारी योजना से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए गए समानता और भेदभाव-निषेध के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि विवाह के बाद बेटी सामान्यतः अपने ससुराल में रहने लगती है, इसलिए उसे परिवार की अलग श्रेणी माना गया है।

मामले में न्यायालय द्वारा नियुक्त अमीकस क्यूरी (Amicus Curiae) ने भी दलील दी कि आश्रित होने का प्रश्न तथ्यों पर निर्भर करता है और इसे केवल वैवाहिक स्थिति से नहीं जोड़ा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आश्रित कोटे का उद्देश्य मृत विक्रेता के परिवार को तत्काल आर्थिक राहत देना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निरंतरता बनाए रखना है।

पीठ ने कहा,

“विवाह किसी बेटी और उसके मायके के बीच के संबंध को समाप्त नहीं करता और न ही यह मान लेने का आधार बन सकता है कि वह अब अपने परिवार पर निर्भर नहीं है।”

अदालत ने माना कि आज के सामाजिक परिवेश में अनेक शादीशुदा बेटियां अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनका सहयोग करती हैं या उन पर निर्भर रहती हैं। इसलिए केवल विवाह के आधार पर उन्हें बाहर करना उचित नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक शादीशुदा बेटे को परिवार का हिस्सा माना जाता है, जबकि बेटी को सिर्फ शादी के कारण बाहर कर दिया जाता है। यह लैंगिक पूर्वाग्रह (Gender Stereotype) पर आधारित सोच है, जो संविधान की भावना के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने के बजाय उसकी उद्देश्यपरक (Purposive) व्याख्या अपनाई।

अदालत ने कहा कि नियमों में प्रयुक्त "बेटी" शब्द का अर्थ केवल अविवाहित, विधवा या परित्यक्ता बेटी तक सीमित नहीं माना जा सकता। यदि कोई शादीशुदा बेटी मृत विक्रेता पर आश्रित थी, स्थानीय निवासी है और अन्य पात्रता शर्तें पूरी करती है, तो उसे भी विचार के लिए पात्र माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुलसुम निशा विवाह के बाद भी उसी गांव में रह रही थीं, अपनी मां की राशन दुकान के संचालन में सहायता करती थीं और मां की मृत्यु के बाद अपनी बहनों, जिनमें एक दृष्टिबाधित बहन भी शामिल है, की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

अदालत ने पाया कि उनके आवेदन को केवल इस आधार पर खारिज किया गया था कि वह शादीशुदा बेटी हैं।

इस आधार को अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट, डिप्टी कमिश्नर और एसडीएम के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर कुलसुम निशा के पक्ष में उचित दर की दुकान का आवंटन आदेश जारी किया जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व के विपरीत निर्णय सही कानून नहीं बताते और उन्हें प्रभावी नहीं माना जाएगा।

Case Details:

Case Title: Kulsum Nisha v. State of U.P. & Ors.

Case Number: Civil Appeal No. 7667 of 2025

Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice Alok Aradhe

Decision Date: June 2, 2026

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