कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में बेंगलुरु की सिविल कोर्ट द्वारा पत्रकार अजय, जो 'कudla Rampage' डिजिटल पोर्टल के संपादक हैं, पर लगाए गए रिपोर्टिंग प्रतिबंध को रद्द कर दिया। यह रोक धार्मस्थल मंदिर प्रशासन पर लगे गंभीर आरोपों की रिपोर्टिंग को रोकने के उद्देश्य से लगाई गई थी। हाईकोर्ट ने इस आदेश को असंवैधानिक और मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया।
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ऐसा व्यापक प्रतिबंध असंवैधानिक पूर्वगामी नियंत्रण है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का स्पष्ट उल्लंघन है।
मामला तब शुरू हुआ जब एक पूर्व सफाईकर्मी ने आरोप लगाया कि 1995 से 2014 के बीच उसे धार्मस्थल मंदिर परिसर में कई मानव अवशेषों को जबरन दफनाने के लिए मजबूर किया गया। इस शिकायत में बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे।
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बाद में सीबीआई की पूर्व स्टेनोग्राफर सुजाता भट्ट ने भी अपनी बेटी के 2003 में मंदिर परिसर से रहस्यमय तरीके से लापता होने की शिकायत की।
पत्रकार अजय ने इन घटनाओं की रिपोर्टिंग की, जिसके बाद श्री हर्षेन्द्र कुमार डी., जो मंदिर ट्रस्ट से जुड़े हैं, ने बेंगलुरु की सिविल कोर्ट में मानहानि का केस दर्ज किया और 338 मीडिया संस्थानों व व्यक्तियों को प्रतिवादी बनाया। कोर्ट ने एक ही दिन में अंतरिम आदेश जारी कर रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी और 8842 वेब लिंक हटाने व “John Doe” आदेश के तहत अज्ञात व्यक्तियों पर भी रोक लगाने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट में चुनौती:
इस आदेश को चुनौती देते हुए अजय ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर की और तर्क दिया कि:यह आदेश पूरी तरह एकपक्षीय है, बिना किसी पक्ष को सुने पारित किया गया है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है और प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वह केवल एफआईआर (अपराध सं. 39/2025) और सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित रिपोर्टिंग कर रहे थे, जो कि जनहित से जुड़ी जानकारी है।
मंदिर ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होल्ला ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पत्रकार को अपील या वैकल्पिक उपाय अपनाना चाहिए था। उन्होंने कोर्ट के आदेश का समर्थन करते हुए कहा:
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"पत्रकार द्वारा प्रकाशित सामग्री झूठी और अपमानजनक है, जिससे मंदिर प्रशासन और परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।"
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की अध्यक्षता वाली एकलपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने आदेश पारित करते समय प्रक्रिया का पालन नहीं किया और यह आदेश Order 39 Rule 3 CPC का उल्लंघन है।
जब नोटिस दिए बिना एकपक्षीय आदेश पारित किया जाता है, तो अदालत को यह स्पष्ट करना आवश्यक होता है कि यदि नोटिस दिया गया तो आदेश का उद्देश्य विफल हो जाएगा – लेकिन इस मामले में ऐसा कोई कारण दर्ज नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के mandatory injunction (अनिवार्य निषेधाज्ञा) केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही बिना प्रतिवादी को सुने दिए जा सकते हैं और इसके लिए ठोस कारण जरूरी होते हैं।
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मीडिया द्वारा किसी एफआईआर या सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित रिपोर्टिंग को तब तक मानहानिपूर्ण नहीं माना जा सकता जब तक वह झूठी या दुर्भावनापूर्ण न हो।
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