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महिला और उसके वकील द्वारा याचिका दाखिल करने से इनकार के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश, पति पर तलाक मामले में धोखाधड़ी का संदेह

Shivam Y.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस मामले में जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें एक महिला और उसके वकील ने याचिका दाखिल करने से इनकार किया। कोर्ट को संदेह है कि महिला के पति ने तलाक की कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए याचिका दायर करवाई।

महिला और उसके वकील द्वारा याचिका दाखिल करने से इनकार के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश, पति पर तलाक मामले में धोखाधड़ी का संदेह

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक असामान्य मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें रानी पांडे नामक महिला और उसके वकील दोनों ने यह कहकर याचिका दाखिल करने से इनकार कर दिया कि उन्होंने ऐसा कोई मुकदमा दायर नहीं किया। कोर्ट को संदेह है कि महिला के पति ने तलाक की कार्यवाही में फायदा उठाने के लिए इस याचिका को गलत तरीके से दाखिल करवाया है।

दस्तावेजों के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें यह दावा किया गया था कि याचिकाकर्ता रानी पांडे और विनोद पांडे ने विवाह किया है और वे महिला के परिवार से खतरे के चलते सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। हालांकि, 27 अप्रैल 2024 को कोर्ट में सुनवाई के दौरान रानी पांडे स्वयं उपस्थित हुईं और इस याचिका की जानकारी से साफ इनकार कर दिया।

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उन्होंने कोर्ट में स्पष्ट कहा:

"मैंने यह याचिका दाखिल नहीं की है, और न ही किसी को ऐसा करने के लिए अधिकृत किया है। किसी ने मेरे आधार कार्ड का गलत उपयोग करके मेरी पहचान का दुरुपयोग किया है।"

उन्होंने बताया कि उनकी विधिवत शादी सम्राट पांडे से हुई है और उनके दो बच्चे हैं। पारिवारिक विवाद के कारण वे फिलहाल अपने पिता के साथ रह रही हैं। उन्होंने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसने तलाक का आधार बनाने के लिए इस याचिका को किसी और के माध्यम से दाखिल करवाया।

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न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस गंभीर मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को प्रारंभिक जांच के आदेश दिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है तो एफआईआर दर्ज की जाए। साथ ही, प्रत्येक तिमाही में जांच की प्रगति की रिपोर्ट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपी जाए।

कोर्ट के रजिस्ट्रार द्वारा कराई गई आंतरिक जांच में यह निष्कर्ष निकला कि:

"यह याचिका न तो रानी पांडे द्वारा और न ही संबंधित वकील द्वारा दाखिल की गई थी।"

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वकील लल्लन चौबे, जिनका नाम याचिका में दर्ज था, ने भी किसी भी तरह की भागीदारी से इनकार किया। उन्होंने अपने हलफनामे में कहा:

"मुझे इस याचिका की जानकारी तब मिली जब कोर्ट से नोटिस आया। मेरे हस्ताक्षर जालसाजी से किए गए हैं।"

कोर्ट ने पाया कि ओथ कमिश्नर ने पहचान सत्यापन में लापरवाही बरती, जिससे यह धोखाधड़ी संभव हो पाई। साथ ही, याचिका दायर करने की प्रक्रिया के दौरान संबंधित वकील को पांच बार एसएमएस नोटिफिकेशन मिलने चाहिए थे, जिससे संदेह और बढ़ गया।

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रानी पांडे के पति सम्राट पांडे ने जवाबी हलफनामे में आरोप लगाया कि उनकी पत्नी का विनोद पांडे के साथ विवाहेतर संबंध है। हालांकि, विनोद पांडे ने भी इस याचिका से खुद को अलग बताया और कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने कहा:

"प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि कोर्ट के साथ धोखाधड़ी की गई है। यह कार्यवाही बिना किसी ऐसे व्यक्ति की मदद के संभव नहीं थी जिसे न्यायालयीय प्रक्रिया की गहरी समझ हो।"

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न्यायमूर्ति दिवाकर ने इस धोखाधड़ी को न्यायिक प्रणाली पर हमला बताते हुए कहा:

"अगर यह साजिश सफल होती, तो यह न्याय प्रणाली पर एक धब्बा होता और कानून के शासन में जनता का भरोसा हिल जाता। ऐसे प्रयासों को पूरी सख्ती से रोका जाना चाहिए।"

कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए, वैज्ञानिक तरीके से निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं और सभी संबंधित दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराने को कहा है।

केस का शीर्षक: रानी पांडे और अन्य बनाम यूपी राज्य और 3 अन्य [रिट - सी संख्या - 12032/2024]

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