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दिल्ली हाईकोर्ट: CGST अधिनियम की धारा 107(6) के तहत अपील दाखिल करते समय प्री-डिपॉजिट माफ करने का कोई विवेकाधिकार नहीं

Vivek G.

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि CGST अधिनियम की धारा 107(6) के तहत अपील दाखिल करते समय प्री-डिपॉजिट की छूट देने का कोई विवेकाधिकार नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित अपीलीय प्राधिकारी से संपर्क करने का निर्देश दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट: CGST अधिनियम की धारा 107(6) के तहत अपील दाखिल करते समय प्री-डिपॉजिट माफ करने का कोई विवेकाधिकार नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स अधिनियम, 2017 (CGST Act) की धारा 107(6) के तहत अपील दाखिल करते समय आवश्यक प्री-डिपॉजिट को माफ करने का कोई विवेकाधिकार नहीं रखती। यह अहम टिप्पणी मेसर्स इम्प्रेसिव डेटा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम कमिश्नर (अपील-I), सेंट्रल टैक्स GST, दिल्ली मामले में की गई।

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याचिकाकर्ता ने अदालत से यह छूट मांगी थी कि वह प्री-डिपॉजिट की अनिवार्यता से छूट दे, यह कहते हुए कि विभिन्न सरकारी विभागों से ₹6.4 करोड़ से अधिक की राशि वसूलनी बाकी है और ₹4 करोड़ मूल्य की प्रतिभूतियां भी उनके पास हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को लेकर जो विवाद है, वह GST व्यवस्था में संक्रमण के दौरान अकाउंटेंट द्वारा की गई गलतियों के कारण हुआ, न कि जानबूझकर।

“धारा 107(6) प्री-डिपॉजिट की छूट के लिए कोई विवेकाधिकार नहीं देती।” — दिल्ली हाईकोर्ट

विभाग ने 2017–18, 2018–19 और 2019–20 के वित्तीय वर्षों के लिए गलत ITC लेने का आरोप लगाते हुए शो-कॉज नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि दो मामलों—मेसर्स DST कुमार ट्रेडर्स और मेसर्स विनय सेल्स कॉर्पोरेशन—में उन्होंने कभी भी ITC क्लेम नहीं किया, इसलिए ये मांग गलत है।

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हालांकि, कोर्ट ने CGST अधिनियम की धारा 107(6) के तहत वैधानिक शर्तों को रेखांकित किया:

“कोई अपील दायर नहीं की जाएगी जब तक कि अपीलकर्ता (a) स्वीकृत कर, ब्याज, जुर्माना आदि की पूरी राशि का भुगतान न कर दे; और (b) शेष विवादित कर राशि का 10%, अधिकतम ₹25 करोड़ तक, प्री-डिपॉजिट के रूप में न जमा कर दे।”

कोर्ट ने डायमंड एंटरटेनमेंट टेक्नोलॉजीज (प्रा.) लि. बनाम कमिश्नर, सेंट्रल गुड्स एंड टैक्स कमिश्नरेट, देहरादून एवं अन्य के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें संशोधित एक्साइज प्रावधानों (2014) के बाद यह तय किया गया कि प्री-डिपॉजिट अनिवार्य है।

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“हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत अंजनी टेक्नोप्लास्ट मामले में निर्धारित कानून का पालन करने के लिए बाध्य हैं।” — दिल्ली हाईकोर्ट

नतीजतन, कोर्ट ने प्री-डिपॉजिट माफ करने की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने यह छूट दी कि यदि कोई राशि सरकारी संस्थाओं के पास जमा है, तो याचिकाकर्ता उसे प्री-डिपॉजिट के रूप में गिनने का अनुरोध अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष कर सकता है। याचिकाकर्ता यह भी दलील दे सकता है कि ₹64 लाख की कुल राशि में से ₹20 लाख पहले ही विभाग के पास जमा है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के मेरिट (गुण-दोष) पर कोई टिप्पणी नहीं की है, और सभी पक्ष अपीलीय मंच पर उठाए जा सकते हैं।

“याचिका इन शर्तों के साथ समाप्त की जाती है। लंबित सभी आवेदनों का भी निपटारा किया जाता है।” — न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ

उपस्थिति: श्री प्रणय जैन, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता; श्री रुचेश सिन्हा, आर-1 के अधिवक्ता

केस का शीर्षक: मेसर्स इम्प्रेसिव डेटा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम आयुक्त (अपील-I), केंद्रीय कर जीएसटी, दिल्ली

केस संख्या: डब्ल्यू.पी.(सी) 4662/2025

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