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GST विवाद में अधिवक्ता पर दर्ज FIR रद्द: इलाहाबाद हाई कोर्ट कहा- पेशेवर सलाह को आपराधिक साजिश नहीं कहा जा सकता

Shivam
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने GST विवाद में अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश रद्द करते हुए कहा कि पेशेवर कानूनी सलाह को आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता। - समर्पण जैन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य

GST विवाद में अधिवक्ता पर दर्ज FIR रद्द: इलाहाबाद हाई कोर्ट कहा- पेशेवर सलाह को आपराधिक साजिश नहीं कहा जा सकता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी अधिवक्ता को सिर्फ इसलिए आपराधिक मामले में आरोपी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उसने अपने मुवक्किल को कानूनी सलाह दी या उसकी ओर से अपील दायर की। कोर्ट ने GST विवाद में एक वकील के खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि यदि पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने वाले वकीलों को साजिशकर्ता मान लिया जाएगा, तो इससे वकालत पेशे की स्वतंत्रता और नागरिकों के कानूनी सहायता के अधिकार पर गंभीर असर पड़ेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता समर्पण जैन एक अधिवक्ता हैं, जो टैक्स और कॉर्पोरेट मामलों में प्रैक्टिस करते हैं। उन्होंने अपने एक क्लाइंट की ओर से GST अधिनियम के तहत अपील दायर की थी। यह अपील टैक्स, ब्याज और पेनल्टी से जुड़े आदेशों को चुनौती देने के लिए दाखिल की गई थी।

विवाद इस बात को लेकर हुआ कि अपील दाखिल करने के लिए आवश्यक 10 प्रतिशत प्री-डिपॉजिट इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर औरइनपुट टैक्स क्रेडिट के माध्यम से जमा किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह तरीका कानूनन स्वीकार्य है और इसके समर्थन में गुजरात हाई कोर्ट का फैसला भी मौजूद था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था।

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हालांकि GST विभाग ने इस तरीके को स्वीकार नहीं किया और बाद में टैक्स चोरी तथा आपराधिक साजिश का आरोप लगाते हुए वकील और उसके क्लाइंट दोनों के खिलाफ FIR दर्ज करा दी।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पूरी तरह अपने पेशेवर दायित्व के तहत कार्य किया था और उपलब्ध न्यायिक फैसलों के आधार पर कानूनी सलाह दी थी।

कोर्ट ने GST अधिकारी से पूछा कि आखिर एक अधिवक्ता को सिर्फ अपील दाखिल करने के कारण FIR में नामजद क्यों किया गया। आदेश में दर्ज है कि इस सवाल पर अधिकारी के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था।

कोर्ट ने कहा:

“यदि किसी पेशेवर कार्य, जैसे अपील दाखिल करने, को साजिश मान लिया जाए, तो यह बार के अस्तित्व पर ही खतरा होगा।”

पीठ ने यह भी कहा कि अधिवक्ताओं को बिना डर के अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। केवल इस आधार पर कि कानूनी सलाह बाद में गलत साबित हो जाए, किसी वकील को अपराधी नहीं माना जा सकता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज FIR, पुलिस रिपोर्ट और संज्ञान आदेश आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत हैं।

कोर्ट ने 4 अक्टूबर 2025 की FIR, चार्जशीट और 14 मई 2026 के संज्ञान आदेश को याचिकाकर्ता अधिवक्ता के संबंध में रद्द कर दिया।

साथ ही कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रामपुर को निर्देश दिया कि पुलिस रिकॉर्ड में यह दर्ज किया जाए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही हाई कोर्ट द्वारा समाप्त कर दी गई है।

Case Details

Case Title: Samarpan Jain vs State of U.P. and 2 Others

Case Number: Criminal Misc. Writ Petition No. 23443 of 2025

Judges: Justice J.J. Munir and Justice Tarun Saxena

Decision Date: May 21, 2026

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