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शादी के झूठे वादे के मामले में बरी आरोपी को राहत, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- लंबे लिव-इन संबंध सहमति का संकेत

Shivam
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शादी का वादा करने से जुड़े एक मामले में एक व्यक्ति को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि सबूतों से लंबे समय तक आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की बात पता चलती है, इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने की कोई वजह नहीं है। - XYZ बनाम सिद्धार्थ सारंगी और अन्य

शादी के झूठे वादे के मामले में बरी आरोपी को राहत, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- लंबे लिव-इन संबंध सहमति का संकेत

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म करने के आरोप वाले मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे और उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि शारीरिक संबंध बिना सहमति के बनाए गए थे। इसी आधार पर पीड़िता की अपील प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील रायपुर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एफटीसी) द्वारा 24 जून 2025 को दिए गए उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(k)(n) और 377 के आरोपों से बरी कर दिया गया था।

पीड़िता का आरोप था कि वर्ष 2019 में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी आरोपी से पहचान हुई। आरोपी ने शादी का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में शादी से इनकार कर दिया। उसने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2021 में आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इन आरोपों के आधार पर 20 दिसंबर 2022 को एफआईआर दर्ज की गई।

पीड़िता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसका शोषण किया। वहीं आरोपी की ओर से कहा गया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से थे और ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

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हाईकोर्ट की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि घटना के समय पीड़िता लगभग 40 वर्ष की, शिक्षित और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि उसने अपनी जिरह में स्वीकार किया था कि वह आरोपी के साथ लगभग दो वर्ष तक लिव-इन रिलेशनशिप में रही और दोनों ने परिवारों की सहमति मिलने पर विवाह करने का निर्णय लिया था।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता के भाई ने अपने बयान में कहा था कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था। वहीं मेडिकल साक्ष्य में भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जिससे बलपूर्वक या अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों की पुष्टि हो सके।

सुप्रीम कोर्ट के रवीश सिंह राणा बनाम उत्तराखंड राज्य फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन संबंध में साथ रहते हैं और सहजीवन बिताते हैं, तो सामान्यतः यह माना जाएगा कि उन्होंने उस संबंध को उसकी प्रकृति और परिणामों को समझते हुए स्वेच्छा से स्वीकार किया था।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे और अभियोजन आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं कर सका।

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के निर्णय में कोई कानूनी त्रुटि, गंभीर अनियमितता या ऐसा दोष नहीं है, जिसके कारण अपीलीय हस्तक्षेप आवश्यक हो। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने का आदेश तथ्यों और कानून के अनुरूप है।

इसके साथ ही बरी करने के फैसले को बरकरार रखते हुए पीड़िता की अपील प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दी गई।

Case Details

Case Title: XYZ v. Siddharth Sarangi & Another

Case Number: ACQA No. 380 of 2025

Judge: Justice Sanjay S. Agrawal and Justice Narendra Kumar Vyas

Decision Date: 29 June 2026

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