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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने मामले में बड़ी राहत दी, एससी/एसटी एक्ट और धमकी की सजा रद्द

Rajan Prajapati

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2004 के विवाद मामले में आरोपियों को आंशिक राहत देते हुए एससी/एसटी एक्ट और धमकी की सजा रद्द कर दी। - मिलाउराम और अन्य. बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने मामले में बड़ी राहत दी, एससी/एसटी एक्ट और धमकी की सजा रद्द
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने करीब 21 साल पुराने एक आपराधिक मामले में दो आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धमकी वाली धारा में दी गई सजा रद्द कर दी। अदालत ने हालांकि अश्लील शब्दों के उपयोग से जुड़ी धारा 294 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि कायम रखी, लेकिन सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला राजनांदगांव जिले का है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद हुआ, जिसके दौरान आरोपियों ने जातिसूचक अपमान किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।

ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2005 में दोनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 294, धारा 506(2) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) में दोषी ठहराया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि शिकायतकर्ता की जाति साबित करने के लिए जो अस्थायी जाति प्रमाणपत्र पेश किया गया, वह पर्याप्त और वैध साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा,

“केवल मौखिक बयान से यह नहीं माना जा सकता कि पीड़ित अनुसूचित जाति वर्ग से है, इसके लिए ठोस और विश्वसनीय प्रमाण जरूरी है।”

कोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि कथित अपमान शिकायतकर्ता की जाति के कारण किया गया था। इसलिए एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।

आईपीसी की धारा 506(2) पर अदालत ने कहा कि केवल कुछ शब्द बोल देना पर्याप्त नहीं है। यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी का उद्देश्य डर पैदा करना था।

पीठ ने कहा,

“रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता को भयभीत करने की नीयत से धमकी दी गई थी।”

कोर्ट ने गवाहों के बयान का हवाला देते हुए माना कि अपमानजनक और अशोभनीय शब्द सार्वजनिक स्थान के पास बोले गए थे। इसलिए धारा 294 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि सही है।

हालांकि घटना वर्ष 2004 की होने, लंबा समय बीत जाने और आरोपियों की उम्र को देखते हुए अदालत ने जेल भेजना उचित नहीं माना।

हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एससी/एसटी एक्ट और धारा 506(2) आईपीसी की सजा रद्द कर दी। धारा 294 आईपीसी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित किया गया और प्रत्येक आरोपी पर ₹2,000 जुर्माना लगाया गया। अतिरिक्त राशि पीड़ित को मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया गया।

Case Details

Case Title: Milauram & Another v. State of Chhattisgarh

Case Number: CRA No. 538 of 2005

Judge: Justice Narendra Kumar Vyas

Decision Date: April 16, 2026

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