एक महत्वपूर्ण फैसले में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने रणजीत सिंह गिल द्वारा दायर दो आपस में जुड़ी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जो शिरोमणि अकाली दल (SAD) के पूर्व नेता हैं और जिन्होंने दो अलग-अलग एफआईआर में किसी भी संभावित गिरफ्तारी से पहले अग्रिम सूचना मांगी थी। याचिकाओं में गिल के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में हाल ही में शामिल होने के बाद राजनीतिक उत्पीड़न का दावा किया गया था।
पहली याचिका में अनुरोध किया गया था कि यदि याचिकाकर्ता को या तो NDPS मामले या भ्रष्टाचार मामले में अभियुक्त के रूप में नामित किया जाना है, तो राज्य को कोई भी गिरफ्तारी करने से पहले उसे कम से कम दो सप्ताह की अग्रिम सूचना प्रदान करनी होगी। दूसरी याचिका में गिल और उनकी कंपनी के लेखाकार को CrPC,की धारा 160 के तहत जारी नोटिसों को रद्द करने का अनुरोध किया गया था, जिसमें उन्हें एक विशेष जांच दल (NDPS) के समक्ष पेश होने के लिए बुलाया गया था।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने कहा कि याचिकाकर्ता को किसी भी एफआईआर में अभियुक्त के रूप में नामित नहीं किया गया है और चूंकि याचिकाकर्ताओं ने उनका पालन नहीं किया था, इसलिए आपत्तिजनक नोटिस पहले ही अप्रासंगिक हो चुके हैं। अदालत ने जोर देकर कहा कि गिरफ्तारी से पहले पूर्व सूचना देने का निर्देश देकर व्यापक सुरक्षा प्रदान करना जांच एजेंसियों की वैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप करेगा।
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राज्य पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि इस तरह के निर्देश विशेष रूप से संज्ञेय अपराधों में जांच में बाधा डालेंगे, और सर्वोच्च न्यायालय के भारत संघ बनाम पदम नारायण अग्रवाल के फैसले का हवाला दिया, जो गिरफ्तारी से पहले अग्रिम सूचना जैसी शर्तें लगाने पर रोक लगाता है। अदालत ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि बिना सबूत के गिरफ्तारी का डर समय से पहले था और यदि आवश्यक हो तो अग्रिम जमानत जैसे कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
यह फैसला पुष्ट करता है कि जांच एजेंसियों को कानून के अनुसार अप कर्तव्यों का पालन करने से नहीं रोका जा सकता है, और गिरफ्तारी के डर से पीड़ित व्यक्तियों को पूर्वनिर्धारित अदालती आदेशों के बजाय उचित कानूनी उपाय करने चाहिए।
मामले का शीर्षक :रणजीत सिंह गिल बनाम पंजाब राज्य और अन्य
मामले का नंबर:(CRM-M-42636-2025 & CRM-M-46624-2025)