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वसंत संपत दुपारे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा पर दोबारा सुनवाई का आदेश दिया

Vivek G.

सुप्रीम कोर्ट ने वसंत संपत दुपारे की फांसी की सज़ा पर दोबारा सुनवाई का आदेश दिया, मनोज केस के दिशानिर्देशों के अनुसार नई प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

वसंत संपत दुपारे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा पर दोबारा सुनवाई का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने वसंत संपत दुपारे की फांसी की सज़ा पर फिर से सुनवाई का आदेश दिया है। दुपारे को 2008 में नागपुर की एक 4 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि सज़ा तय करते समय मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) केस में दिए गए दिशानिर्देशों का पालन जरूरी है, जिनमें मौत की सज़ा देने से पहले सभी नरमी के पहलुओं (mitigating factors) की जांच करने की बात कही गई है।

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केस की पृष्ठभूमि

अप्रैल 2008 में दुपारे ने 4 साल की बच्ची को बहला-फुसलाकर ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म और हत्या कर दी थी। अगले दिन ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया और 2010 में सत्र न्यायालय ने उसे मौत की सज़ा सुनाई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2012 में इस फैसले को बरकरार रखा और 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सज़ा की पुष्टि कर दी। 2017 में उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज हो गई। महाराष्ट्र के राज्यपाल और राष्ट्रपति ने भी उसकी दया याचिका ठुकरा दी।

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दुपारे की ओर से कहा गया कि सज़ा सुनाते समय मनोज केस के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया। इन दिशानिर्देशों में आरोपी की मानसिक स्थिति, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, जेल में व्यवहार और परिवार का इतिहास शामिल कर रिपोर्ट तैयार करने का प्रावधान है।

वकीलों ने यह भी बताया कि दुपारे गंभीर अवसाद (depression), मानसिक विकार और सीखने में कमी जैसी बीमारियों से पीड़ित है, लेकिन अदालत ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उनका कहना था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत हर व्यक्ति को निष्पक्ष और इंसानियत से जुड़ी सज़ा की प्रक्रिया मिलनी चाहिए।

“हमारे संविधान की ताकत राज्य की शक्ति में नहीं बल्कि उसके संयम में है। जब मौत की सज़ा दी जाती है, तो यह तभी संभव है जब निष्पक्षता के हर सुरक्षा उपायों का पालन किया गया हो,” सुप्रीम कोर्ट ने कहा।

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केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सभी न्यायिक रास्ते और दया याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि मनोज केस के दिशानिर्देश भविष्य के लिए हैं और पुराने मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता। सरकार का कहना था कि दुपारे समाज के लिए ख़तरा है और उसमें कोई पछतावा नहीं है।

सभी दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 32 अदालत को यह अधिकार देता है कि वह मौत की सज़ा के मामलों में सज़ा सुनाने की प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करे, अगर निष्पक्षता और कानूनी सुरक्षा के नियमों का पालन नहीं हुआ हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मनोज केस के दिशानिर्देश अब अनुच्छेद 14 और 21 के तहत जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि दुपारे की दोषसिद्धि (conviction) बरकरार रहेगी, लेकिन उसकी फांसी की सज़ा फिलहाल रद्द कर दी गई है। अब इस मामले में नई सुनवाई होगी और सज़ा का फैसला मनोज केस के दिशानिर्देशों के अनुसार होगा।

मामला: वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ एवं अन्य

मामला संख्या: रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 371/2023

निर्णय तिथि: 2025 आईएनएससी 1043

याचिकाकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन

प्रतिवादी के वकील:

  • भारत संघ की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज;
  • महाराष्ट्र राज्य की ओर से महाधिवक्ता डॉ. बीरेंद्र सराफ

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