दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य बार काउंसिल द्वारा पारित हर आदेश के खिलाफ सीधे अधिवक्ता अधिनियम की धारा 37 के तहत अपील नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि यदि आदेश अनुशासन समिति (Disciplinary Committee) द्वारा पारित नहीं हुआ है, तो प्रभावित पक्ष को धारा 48-A के तहत रिवीजन याचिका दाखिल करनी होगी।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की पीठ ने यह फैसला एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें याचिकाकर्ता ने दो वकीलों पर पेशेवर लापरवाही और misconduct के आरोप लगाए थे।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सी. अशोक कुमार का कहना था कि उन्होंने अपनी बेटी की ओर से रिव्यू पिटीशन दाखिल कराने के लिए दो अधिवक्ताओं को नियुक्त किया था। आरोप था कि वकीलों ने ₹55,000 फीस लेने और दस्तावेज प्राप्त करने के बावजूद समय पर रिव्यू पिटीशन दाखिल नहीं की।
याचिकाकर्ता के अनुसार, बार-बार संपर्क करने के बावजूद उन्हें ड्राफ्ट नहीं दिया गया और बाद में वकालतनामा व हलफनामे की कमी का हवाला दिया गया। उनका कहना था कि ये आपत्तियां पहले कभी नहीं बताई गईं, जिससे रिव्यू दाखिल करने की समयसीमा निकल गई।
इसके बाद उन्होंने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पेशेवर misconduct की शिकायत दर्ज कराई।
सुनवाई के दौरान संबंधित वकीलों ने कहा कि फीस और दस्तावेज वापस कर दिए गए थे। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ दिल्ली ने 25 अप्रैल 2024 को शिकायत खारिज कर दी।
आदेश में कहा गया, “प्रथम दृष्टया पेशेवर या अन्य दुराचार (misconduct) का कोई मामला नहीं बनता।”
इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया में धारा 37 के तहत अपील दायर की।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 9 जनवरी 2026 के पत्र में कहा कि धारा 37 के तहत ऐसी अपील सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि चुनौती दिया गया आदेश राज्य बार काउंसिल द्वारा पारित किया गया था, न कि उसकी अनुशासन समिति द्वारा।
बीसीआई ने याचिकाकर्ता को धारा 48-A के तहत रिवीजन याचिका दाखिल करने की सलाह दी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिवक्ता अधिनियम की विभिन्न धाराओं का विश्लेषण करते हुए कहा कि धारा 37 केवल उन मामलों में अपील का अधिकार देती है, जहां आदेश राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति द्वारा पारित किया गया हो।
अदालत ने कहा, “धारा 48-A बार काउंसिल ऑफ इंडिया को रिवीजन की शक्ति देती है, जहां वैधानिक अपील उपलब्ध नहीं होती।”
कोर्ट ने माना कि इस मामले में आदेश बार काउंसिल ऑफ दिल्ली ने पारित किया था, इसलिए बीसीआई का यह कहना सही था कि याचिकाकर्ता को रिवीजन का रास्ता अपनाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्र में “कोई अवैधता या त्रुटि” नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को धारा 48-A के तहत रिवीजन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।
Case Details
Case Title: Mr. C. Asok Kumar v. Bar Council of India
Case Number: W.P.(C) 6796/2026
Judge: Justice Purushaindra Kumar Kaurav
Decision Date: May 18, 2026




