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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हरियाणा अनुकंपा सहायता योजना का हवाला देकर बीमा कंपनी मृतक की मां को मुआवजा देने से बच नहीं सकती।

CB News Desk

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृत सरकारी कर्मचारी की मां को मोटर दुर्घटना मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही पत्नी और बेटी को सरकारी वित्तीय सहायता मिल रही हो। - सरला देवी और अन्य बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हरियाणा अनुकंपा सहायता योजना का हवाला देकर बीमा कंपनी मृतक की मां को मुआवजा देने से बच नहीं सकती।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मोटर दुर्घटना में मृत सरकारी कर्मचारी की आश्रित मां को केवल इस आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता कि मृतक की पत्नी और बेटी को हरियाणा सरकार की वित्तीय सहायता योजना का लाभ मिल रहा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि दोहरी आर्थिक भरपाई रोकने के लिए सरकारी सहायता राशि को मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाले मुआवजे से समायोजित किया जा सकता है, लेकिन इससे मां के स्वतंत्र अधिकार समाप्त नहीं होते।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2012 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। हरियाणा पुलिस में कार्यरत 25 वर्षीय कांस्टेबल सचिन कुमार की उस समय मौत हो गई थी, जब एक ट्रॉला कथित तौर पर गलत दिशा में आकर उनकी मोटरसाइकिल से टकरा गया।

इसके बाद मृतक की पत्नी, नाबालिग बेटी, मां और पिता ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष मुआवजे की याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने दुर्घटना के लिए ट्रॉला चालक की लापरवाही मानते हुए परिवार को 37 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

हालांकि, बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की 2006 की वित्तीय सहायता योजना के तहत परिवार को मिलने वाली ₹29.21 लाख की सहायता राशि को समायोजित करते हुए कुल मुआवजा घटाकर ₹7.70 लाख कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या 2006 नियमों के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता को मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवजे से घटाया जा सकता है। अदालत ने अपने पुराने फैसले रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम शशि शर्मा का हवाला देते हुए कहा कि “आय की हानि” के तहत एक ही नुकसान की दो बार भरपाई नहीं हो सकती।

लेकिन कोर्ट ने यह भी पाया कि हाई कोर्ट ने मृतक की मां की स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अदालत ने कहा कि 2006 नियमों के अनुसार मृतक की मां वित्तीय सहायता पाने की पात्र नहीं थी, क्योंकि मृतक अपने पीछे पत्नी और बच्ची छोड़ गया था।

पीठ ने कहा, “मां को 2006 नियमों के तहत अनुग्रह सहायता नहीं मिल सकती, लेकिन इससे बेटे की अचानक मृत्यु से हुए उसके स्वतंत्र कानूनी नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने आगे कहा कि सामाजिक कल्याण कानूनों के तहत दिया जाने वाला मुआवजा “न्यायसंगत और उचित” होना चाहिए और बीमा कंपनी को इसका अनुचित लाभ नहीं मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि हरियाणा सरकार से मिलने वाली सहायता राशि को दोहरी भरपाई रोकने के लिए समायोजित किया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने मृतक की मां के हिस्से का मुआवजा बहाल कर दिया।

कोर्ट ने मां को ₹11.30 लाख देने का आदेश दिया, जो “निर्भरता का नुकसान” के तहत निर्धारित राशि का एक-तिहाई हिस्सा था। यह राशि हाई कोर्ट द्वारा दिए गए ₹7.70 लाख के अतिरिक्त होगी।

इस तरह कुल मुआवजा बढ़ाकर ₹19.01 लाख कर दिया गया। अदालत ने संबंधित पक्षों को आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: Sarla Devi & Ors. v. Reliance General Insurance Company Limited & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (Civil) No. 13979 of 2018

Judges: Justice Vikram Nath, Justice Sandeep Mehta, and Justice Vijay Bishnoi

Decision Date: May 26, 2026

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