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वकीलों के लिए आधार जैसी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री पर सुप्रीम कोर्ट का विचार, अधिवक्ताओं के सत्यापन तंत्र पर मांगा व्यापक सुझाव

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के लिए आधार-जैसी नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री और सोशल मीडिया पर व्यवहार के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने की मांग वाली याचिका पर विचार किया और साथ ही इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से व्यापक बातचीत करने को कहा। - बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य।

वकीलों के लिए आधार जैसी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री पर सुप्रीम कोर्ट का विचार, अधिवक्ताओं के सत्यापन तंत्र पर मांगा व्यापक सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के अधिवक्ताओं के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल सत्यापन प्रणाली बनाने के प्रस्ताव पर विचार किया। यह प्रस्ताव कानूनी पेशे में पारदर्शिता बढ़ाने और अधिवक्ताओं की योग्यता व पंजीकरण की वास्तविक समय में जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रखा गया है।

बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह एक अभिनव विचार है, लेकिन इसे लागू करने से पहले विभिन्न हितधारकों की राय लेना आवश्यक होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका में नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री फॉर द लीगल प्रोफेशन ऑफ इंडिया (NDRLP) स्थापित करने की मांग की गई है। प्रस्तावित रजिस्ट्री एक राष्ट्रीय स्तर का डिजिटल डेटाबेस होगी, जिसमें देश के सभी पंजीकृत अधिवक्ताओं का सत्यापित रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान में अधिवक्ताओं का रिकॉर्ड अलग-अलग राज्य बार काउंसिलों के पास मौजूद है और कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं है जिसके माध्यम से अदालत, वादकारी या सरकारी प्राधिकरण तुरंत यह सत्यापित कर सकें कि कोई व्यक्ति वास्तव में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत है या नहीं।

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प्रस्ताव के अनुसार प्रत्येक अधिवक्ता को एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान संख्या दी जाएगी, जो उसकी शैक्षणिक योग्यता, नामांकन स्थिति और अनुशासनात्मक रिकॉर्ड से जुड़ी होगी। याचिका में अधिवक्ताओं के सोशल मीडिया आचरण को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने की भी मांग की गई है।

न्यायालय की टिप्पणियां

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने तकनीक आधारित इस पहल को महत्वपूर्ण बताया।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह एक बहुत ही नवाचारी विचार प्रतीत होता है। आज के समय में तकनीक की मदद से इसे लागू किया जा सकता है।”

हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिवक्ताओं की योग्यता और डिग्री के सत्यापन के लिए देशभर के विधि विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी आवश्यक होगी।

पीठ ने कहा कि किसी भी राष्ट्रीय सत्यापन प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड का प्रमाणिक सत्यापन कैसे किया जाता है।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को पहले एक व्यावहारिक और विस्तृत ढांचा प्रस्तुत करने की सलाह दी।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “पहले एक मॉडल या व्यवस्था तैयार कीजिए। उसके बाद हम देखेंगे कि आगे क्या किया जा सकता है।”

सोशल मीडिया पर अधिवक्ताओं के आचरण पर चर्चा

सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर कुछ व्यक्तियों द्वारा स्वयं को कानूनी पेशे से जुड़ा बताकर किए जा रहे आचरण का मुद्दा भी उठा।

न्यायालय ने कहा कि उसने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जिनमें आपत्तिजनक टिप्पणियां और सामग्री प्रसारित की गई है।

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “हम ऐसे कुछ नमूने दिखा सकते हैं जिनमें बेहद आपत्तिजनक बयान दिए गए हैं।”

हालांकि पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकांश अधिवक्ता अपने पेशेवर दायित्वों और नैतिक मूल्यों का पालन करते हैं।

न्यायालय ने कहा, “अधिवक्ता सामान्यतः बहुत जिम्मेदार होते हैं। पेशे में प्रवेश के साथ ही उन्हें पेशेवर नैतिकता का प्रशिक्षण मिलता है।”

मुख्य न्यायाधीश ने युवा अधिवक्ताओं को अवसर और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कई युवा वकील संगठन रचनात्मक गतिविधियों और अकादमिक कार्यक्रमों के माध्यम से पेशे को मजबूत बनाने का काम कर रहे हैं।

न्यायालय का आदेश

सभी पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, विभिन्न राज्य बार काउंसिलों तथा अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को प्रस्तावित डिजिटल रजिस्ट्री का विस्तृत नीति-पत्र और कार्यान्वयन ढांचा रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति दी। साथ ही कहा कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले संबंधित हितधारकों की राय पर विचार किया जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई न्यायालय के अवकाश के बाद निर्धारित की गई है।

Case Details

Case Title: Bar Association of India & Anr. v. Union of India & Ors.

Case Number: W.P.(C) No. 727/2026

Judge: Chief Justice of India Surya Kant and Justice V. Mohana

Decision Date: June 18, 2026

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