सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अपीलों की सुनवाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) के पास भेज दिया है। अदालत ने यह सवाल उठाया है कि क्या किसी हाईकोर्ट में दो जजों की पीठ के बीच मतभेद होने पर मामले को सुनने वाला तीसरा जज उन मुद्दों पर भी फैसला बदल सकता है, जिन पर दोनों जज पहले ही एकमत हो चुके हों।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य की सही व्याख्या पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ में वर्ष 1991 में हुई एक हत्या से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2001 में अनिल रस्तोगी, अजय रस्तोगी और अतुल रस्तोगी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इसके खिलाफ तीनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील की सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच के दोनों जज अनिल और अजय की दोषसिद्धि बरकरार रखने पर सहमत थे। हालांकि, अतुल रस्तोगी को लेकर दोनों जजों की राय अलग-अलग थी। एक जज उसे बरी करने के पक्ष में थे, जबकि दूसरे जज उसकी दोषसिद्धि बनाए रखना चाहते थे।
मतभेद के कारण मामला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 392 के तहत तीसरे जज के पास भेजा गया।
तीसरे जज ने केवल अतुल रस्तोगी के मामले पर ही विचार नहीं किया, बल्कि अनिल और अजय के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि की भी दोबारा समीक्षा की।
साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के बाद तीसरे जज ने तीनों भाइयों को बरी कर दिया। यह फैसला इसलिए विवाद का विषय बना क्योंकि अनिल और अजय के संबंध में पहले दोनों जज उनकी दोषसिद्धि को सही ठहरा चुके थे।
इसके बाद शिकायतकर्ता और उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 392 CrPC की व्याख्या करते समय यह समझना जरूरी है कि कानून में “an appeal” और “the appeal” जैसे शब्दों का क्या महत्व है।
पीठ ने कहा कि जिस अपील में वास्तव में मतभेद हुआ है, केवल वही अपील तीसरे जज के समक्ष जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि अनिल और अजय की दोषसिद्धि को लेकर दोनों जजों में कोई मतभेद नहीं था। इसलिए उनके मामलों को तीसरे जज के समक्ष नहीं भेजा जाना चाहिए था।
पीठ ने टिप्पणी की, “जहां राय में कोई मतभेद नहीं है, वहां संबंधित अपील तीसरे जज के समक्ष नहीं रखी जानी चाहिए।”
सुनवाई के दौरान अदालत ने सज्जन सिंह मामले में दिए गए फैसले पर गंभीर सवाल उठाए। उस फैसले में कहा गया था कि तीसरा जज पूरे मामले की स्वतंत्र रूप से समीक्षा कर सकता है और वह उन निष्कर्षों से भी बंधा नहीं है, जिन पर पहले दोनों जज सहमत रहे हों।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या कई असंगत और अनुचित परिणाम पैदा कर सकती है। इससे ऐसी स्थिति बन सकती है जहां तीसरा जज दो जजों की सर्वसम्मत राय को भी पलट दे।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि इस सिद्धांत को बिना किसी सीमा के लागू किया जाए तो संयुक्त अपील (Composite Appeal) दायर करने वाले आरोपियों को अनुचित लाभ मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य में प्रतिपादित कानूनी सिद्धांत से सम्मानपूर्वक असहमति व्यक्त करते हुए यह प्रश्न बड़ी पीठ के विचारार्थ भेज दिया कि क्या वह फैसला सही कानून निर्धारित करता है।
पीठ ने कहा कि इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर बड़ी पीठ की राय आने के बाद ही वर्तमान अपीलों पर अंतिम निर्णय दिया जाएगा। इसलिए मामले में अंतिम निष्कर्ष फिलहाल सुरक्षित रखा गया है।
Case Details
Case Title: Dr. Rakesh Kumar Gupta v. State of Uttar Pradesh & Ors.; State of Uttar Pradesh v. Anil Rastogi & Ors.
Case Number: Criminal Appeal Nos. 2372 and 2373 of 2026
Judge: Justice Dipankar Datta and Justice Satish Chandra Sharma
Decision Date: June 9, 2026














