इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि विवाह का तथ्य विवादित नहीं है, तो विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति पारस्परिक तलाक याचिका को रोक नहीं सकती। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने यह फैसला सुनाते हुए आज़मगढ़ की फैमिली कोर्ट का वह आदेश निरस्त कर दिया, जिसमें लंबित तलाक प्रकरण में विवाह प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर ज़ोर दिया गया था।
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मामले की पृष्ठभूमि
पति-पत्नी ने हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) के तहत तलाक के लिए संयुक्त याचिका दायर की थी। उनका विवाह जून 2010 में संपन्न हुआ था, किंतु उसका पंजीकरण नहीं हुआ। पति ने विवाह प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने से छूट मांगी, जिसे पत्नी ने भी समर्थन दिया। बावजूद इसके, फैमिली कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को आवेदन खारिज कर दिया और 1956 के हिन्दू विवाह एवं तलाक नियमावली की धारा 3(क) का हवाला देते हुए पंजीकरण अंश प्रस्तुत करने को अनिवार्य बताया।
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हाईकोर्ट ने कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 8 केवल विवाह के प्रमाण हेतु है, न कि विवाह को अमान्य करने के लिए। न्यायालय ने टिप्पणी की:
"फैमिली कोर्ट द्वारा विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने पर ज़ोर देना पूर्णत: अनुचित है।"
सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि यदि विवाह वैध रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ है, तो उसका पंजीकरण न होना उसे अमान्य नहीं बनाता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया संबंधी कानून न्याय की राह आसान करने के लिए होते हैं, न कि तकनीकी आधार पर उसे रोकने के लिए।
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अदालत ने सीमा बनाम अश्विनी कुमार (2006) और डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल (2024) जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया। इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि विवाह पंजीकरण के साक्ष्यात्मक महत्व हैं, लेकिन यह वैधता का एकमात्र आधार नहीं है। न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि प्रक्रिया संबंधी कानूनों को दंडात्मक अवरोध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2025 का आदेश निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट को तलाक की याचिका शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई और पर्याप्त अवसर दिया जाए तथा अनावश्यक स्थगन से बचा जाए।
केस का शीर्षक: सुनील दुबे बनाम मीनाक्षी
केस संख्या: अनुच्छेद 227 संख्या 9347/2025 के अंतर्गत मामले