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बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल बाद जारी ड्रग प्राइसिंग डिमांड नोटिस रद्द किया, ‘देरी और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन’ बताया

Shivam
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल की देरी और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर दवा मूल्य निर्धारण से जुड़ा केंद्र का डिमांड नोटिस रद्द कर दिया। - ट्रिडोस लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल बाद जारी ड्रग प्राइसिंग डिमांड नोटिस रद्द किया, ‘देरी और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन’ बताया

मुंबई में सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में केंद्र सरकार द्वारा जारी दवा मूल्य निर्धारण (drug pricing) से जुड़ा डिमांड नोटिस खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि कार्रवाई में अत्यधिक देरी और उचित प्रक्रिया का पालन न करने से याचिकाकर्ता के साथ अन्याय हुआ।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला ट्राइडोस लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड भारत संघ से जुड़ा है, जिसमें कंपनी ने 2016 के डिमांड नोटिस और 2017 में तहसीलदार द्वारा जारी वसूली नोटिस को चुनौती दी थी।

सरकार का आरोप था कि कंपनी ने 2004 से 2006 के बीच एक दवा (Theophylline CR 300 mg) अधिक कीमत पर बेची। हालांकि कंपनी का कहना था कि उस समय इस दवा पर कोई निर्धारित अधिकतम कीमत (ceiling price) लागू नहीं थी।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि संबंधित दवा को 2006 के बाद ही मूल्य नियंत्रण सूची में शामिल किया गया, जबकि कंपनी ने उसी साल इसका उत्पादन बंद कर दिया था।

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न्यायमूर्ति मनीष पितले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिर्साट की खंडपीठ ने मामले की समयरेखा पर गंभीर सवाल उठाए।

अदालत ने कहा कि पहली नोटिस कथित तौर पर 2008 में भेजी गई थी, लेकिन उसके सेवा (delivery) का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था। वास्तविक नोटिस 2015 में जारी हुई यानी कथित घटना के लगभग 9 साल बाद।

बेंच ने स्पष्ट कहा:

“इतनी लंबी देरी के बाद कार्रवाई करना उचित नहीं है, खासकर जब इससे पक्षकार अपनी रक्षा प्रस्तुत करने में असमर्थ हो जाए।”

अदालत ने यह भी पाया कि कंपनी ने बताया था कि उसके रिकॉर्ड केवल 5 साल तक सुरक्षित रखे जाते हैं, इसलिए पुराने डेटा उपलब्ध नहीं थे।

कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई में भी निष्पक्षता जरूरी है।

“प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है, जिसमें उचित सुनवाई और कारणों का उल्लेख शामिल है,” बेंच ने कहा।

यह पाया गया कि:

• कंपनी को व्यक्तिगत सुनवाई नहीं दी गई

• आदेश में कारण दर्ज नहीं किए गए

• सीधे वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई

अदालत ने इसे “निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन” माना।

मामले के गुण-दोष (merits) पर भी कोर्ट ने सरकार के तर्कों को स्वीकार नहीं किया।

सरकार ने दावा किया कि “SR (sustained release)” और “CR (controlled release)” दवाएं समान हैं।

लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि:

“यदि दोनों समान होते, तो अलग से नोटिफिकेशन जारी करने की आवश्यकता नहीं होती।”

अदालत ने माना कि संबंधित दवा को बाद में अलग से मूल्य नियंत्रण में शामिल किया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि पहले उस पर कीमत लागू नहीं थी।

इन सभी कारणों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 2016 का डिमांड नोटिस और 2017 का वसूली नोटिस दोनों को रद्द कर दिया।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि देरी, उचित प्रक्रिया की कमी और तथ्यों की अनदेखी के कारण पूरी कार्रवाई टिकाऊ नहीं है।

Case Details

Case Title: Tridoss Laboratories Pvt. Ltd. & Anr. v. Union of India & Ors.

Case Number: Writ Petition No. 2789 of 2017

Judge: Justice Manish Pitale & Justice Shreeram V. Shirsat

Decision Date: April 15, 2026

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