बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने पत्नी को दिए गए मेंटेनेंस आदेश को बरकरार रखते हुए पति की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि धारा 125 CrPC के तहत “उपेक्षा” या “इनकार” केवल सीधे शब्दों में ही साबित होना जरूरी नहीं है, बल्कि पति के व्यवहार और आचरण से भी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फलके ने यह फैसला पति द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
पत्नी के अनुसार, दोनों की शादी 16 अप्रैल 2012 को हुई थी। शादी के बाद जब वह ससुराल पहुंची तो दहेज कम लाने को लेकर विवाद शुरू हो गया और उसे मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
महिला ने अदालत को बताया कि 4 जून 2014 को पति ने बेल्ट से मारपीट की, जिसके बाद वह पुलिस स्टेशन पहुंची। बाद में मामला महिला प्रकोष्ठ भेजा गया, लेकिन समझौते की कोशिशें सफल नहीं हुईं और उसे मायके में रहना पड़ा।
पत्नी ने कहा कि पति रेलवे विभाग में गैंगमैन के पद पर कार्यरत है और लगभग ₹25,000 मासिक वेतन प्राप्त करता है, जबकि उसकी खुद की कोई आय नहीं है।
फैमिली कोर्ट ने पति को 14 जनवरी 2017 से 31 दिसंबर 2020 तक ₹5,000 प्रति माह, उसके बाद 31 अगस्त 2024 तक ₹6,000 प्रति माह और 1 सितंबर 2024 से ₹7,000 प्रति माह मेंटेनेंस देने का आदेश दिया था।
पति की ओर से कहा गया कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी, इसलिए वह मेंटेनेंस की हकदार नहीं है।
यह भी तर्क दिया गया कि पत्नी ने तलाक की याचिका दायर की थी, जिससे साफ है कि वह पति के साथ रहना नहीं चाहती थी।
पति ने अदालत से कहा कि उसकी ओर से “उपेक्षा” या “मेंटेनेंस देने से इनकार” साबित नहीं हुआ है, इसलिए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए मारपीट और प्रताड़ना के आरोप जिरह के दौरान कमजोर नहीं पड़े।
अदालत ने यह भी नोट किया कि तलाक मामले में नोटिस मिलने के बावजूद पति ने उसका विरोध नहीं किया।
कोर्ट ने कहा, “पति द्वारा पत्नी के साथ रहने से इनकार या उसकी उपेक्षा केवल स्पष्ट शब्दों से ही नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से भी साबित हो सकती है।”
जस्टिस जोशी-फलके ने आगे कहा कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी बिना उचित कारण के अलग रह रही थी।
अदालत ने यह भी माना कि पति ने यह जानने की कोशिश तक नहीं की कि अलग रहने के बाद पत्नी किस परिस्थिति में जीवन गुजार रही है।
हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया मेंटेनेंस आदेश “उचित और न्यायसंगत” है। इसके साथ ही अदालत ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान करे।
Case Details
Case Title: M J vs L M J
Case Number: Criminal Revision Application No. 183 of 2024
Judge: Justice Urmila Joshi-Phalke
Decision Date: April 10, 2026




