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‘समझौते की कोई संभावना नहीं’: बॉम्बे हाई कोर्ट ने लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद में मध्यस्थता की अर्जी खारिज की

Shivam Y.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पक्ष की सहमति के बिना अदालत मध्यस्थता नहीं थोप सकती, खासकर तब जब पहले भी सुलह के प्रयास विफल हो चुके हों। - बाबासाहेब नीलकंठ कल्याणी बनाम सुगंधा हिरेमथ और अन्य।

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‘समझौते की कोई संभावना नहीं’: बॉम्बे हाई कोर्ट ने लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद में मध्यस्थता की अर्जी खारिज की
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि अदालत किसी पक्ष की इच्छा के विरुद्ध उसे मध्यस्थता (मेडिएशन) के लिए मजबूर नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि मध्यस्थता का मूल आधार आपसी सहमति है और यदि पक्षकारों के बीच समझौते की वास्तविक संभावना नहीं दिखती, तो मामला जबरन मेडिएशन में भेजना उचित नहीं होगा।

जस्टिस राजेश एस. पाटिल एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 1994 के कथित फैमिली अरेंजमेंट के विशेष पालन (specific performance) की मांग की गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

वादियों में शामिल सुगंधा हिरेमठ, प्रतिवादी बाबासाहेब नीलकंठ कल्याणी की बहन हैं। परिवार के सदस्यों के बीच कई दीवानी मुकदमे, प्रॉबेट याचिकाएं और संपत्ति विवाद पहले से विभिन्न अदालतों में लंबित हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने रिश्तों को देखते हुए पक्षकारों को मध्यस्थता पर विचार करने का सुझाव दिया था। हालांकि, प्रतिवादी नंबर 1 की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. वीरेंद्र तुलजापुरकर ने कहा कि उनके मुवक्किल अब मामले की मेरिट पर सुनवाई चाहते हैं।

उन्होंने अदालत को बताया कि पहले भी सुप्रीम कोर्ट और पुणे जिला अदालत में मध्यस्थता के प्रयास हो चुके हैं, लेकिन वे सफल नहीं हुए। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि हर बार सुलह की बातचीत शुरू होते ही मीडिया में खबरें प्रकाशित होने लगती हैं, जिससे उनके मुवक्किल को निवेशकों के सवालों का सामना करना पड़ता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “मध्यस्थता तभी प्रभावी हो सकती है जब दोनों पक्ष वास्तव में समझौते की संभावना के लिए तैयार हों।”

कोर्ट ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 और CPC की धारा 89 का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून में मध्यस्थता को “स्वैच्छिक” और “आपसी सहमति” पर आधारित प्रक्रिया माना गया है। अदालत ने यह भी नोट किया कि वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियममें प्री-लिटिगेशन मेडिएशन को अनिवार्य बनाया गया है, लेकिन सामान्य दीवानी मुकदमों में ऐसी बाध्यता नहीं है।

जस्टिस पाटिल ने कहा कि यदि एक पक्ष स्पष्ट रूप से मेडिएशन का विरोध कर रहा हो, तो अदालत को पहले यह संतुष्ट होना होगा कि समझौते की वास्तविक संभावना मौजूद है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रूपा एंड कंपनी लिमिटेड बनाम फिरहाद हकीम का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि “मध्यस्थता किसी पक्ष पर थोपी नहीं जा सकती।”

कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में वरिष्ठ मध्यस्थ श्रीराम पंचू की नियुक्ति कर पूरे परिवारिक विवाद को सुलझाने की कोशिश की थी, लेकिन वह प्रयास असफल रहा। इसके अलावा पुणे जिला अदालत में भी मध्यस्थता सफल नहीं हो सकी।

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अदालत ने यह भी नोट किया कि हालिया सुनवाई के दौरान पक्षकारों को “without prejudice” आधार पर समझौता प्रस्ताव साझा करने का अवसर दिया गया था, लेकिन 12 दिनों के बाद भी कोई ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आया।

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में समझौते की कोई वास्तविक संभावना दिखाई नहीं देती। अदालत ने वादियों की वह मांग खारिज कर दी, जिसमें विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध किया गया था।

Case Details

Case Title: Babasaheb Neelkanth Kalyani vs Sugandha Hiremath & Ors.

Case Number: Interim Application No. 5241 of 2025 in Suit No. 250 of 2023

Judge: Justice Rajesh S. Patil

Decision Date: May 4, 2026

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