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बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाल शोषण मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया, कहा कि नाबालिग को धमकी देना और उस पर हमला करना "मामूली" नहीं है।

Rajan Prajapati
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गोवा हाईकोर्ट ने नाबालिग से मारपीट और धमकी के मामले में FIR रद्द करने से इनकार किया, कहा कि आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और ट्रायल जरूरी है। - हेलसिनो ए. फर्नांडेस और अन्य बनाम राज्य और अन्य।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाल शोषण मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया, कहा कि नाबालिग को धमकी देना और उस पर हमला करना "मामूली" नहीं है।

बम्बई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में नाबालिग लड़के से कथित मारपीट और धमकी से जुड़े मामले में FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर हैं और जांच व ट्रायल को रोका नहीं जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक नाबालिग लड़के की शिकायत से जुड़ा है, जिसने आरोप लगाया कि आरोपियों ने उसे पहले भी हमला किया था और बाद में समुद्र तट पर उसे पकड़कर धमकाया और मारने की धमकी दी।

पुलिस के आधार पर आईपीसी की धारा 323 (मारपीट) और 506 (आपराधिक खतरनाक याचिका) के साथ-साथ गोवा बाल अधिनियम की धारा 8 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की।

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कोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयान का अवलोकन करते हुए पाया कि आरोप केवल मामूली विवाद तक सीमित नहीं हैं।

न्यायालय ने कहा कि:

“आरोपों को प्रथम दृष्टया देखने पर यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ताओं का इरादा पीड़ित को शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाने का था।”

कोर्ट ने यह भी माना कि नाबालिग को दी गई धमकियाँ उसके मन में भय पैदा करने के लिए पर्याप्त थीं।

इसके साथ ही, अदालत ने गोवा बाल अधिनियम की धारा 8 की व्याख्या करते हुए कहा कि:

“एकल घटना भी ‘child abuse’ की श्रेणी में आ सकती है, यह आवश्यक नहीं कि दुर्व्यवहार लगातार या आदतन हो।”

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी बच्चे को धमकाना, डराना या शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाने का प्रयास भी कानून के दायरे में गंभीर अपराध हो सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि FIR को रद्द करने की शक्ति (inherent jurisdiction) का उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने पाया कि:

• शिकायत और चार्जशीट में पर्याप्त सामग्री मौजूद है

• गवाहों के बयान आरोपों को समर्थन देते हैं

• मामला पूरी तरह से ट्रायल के दौरान ही तय हो सकता है

न्यायालय ने कहा:

“इस स्तर पर FIR को रद्द करना उचित नहीं है, क्योंकि आरोप prima facie अपराध को दर्शाते हैं।”

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, गोवा हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और FIR व चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला आगे ट्रायल कोर्ट में चलेगा।

Case Details

Case Title: Helcino A. Fernandes & Ors. vs State & Ors.

Case Number: Criminal Writ Petition No. 20 of 2026

Judge: Justice Ashish S. Chavan

Decision Date: 29 April 2026

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