दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब किसी मामले में बच्चों की जैविक पहचान (Biological Identity) और पितृत्व (Paternity) का प्रश्न सीधे तौर पर विवाद का विषय हो, तब केवल कथित पिता की सामाजिक प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत असहजता के आधार पर डीएनए परीक्षण से इनकार नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति के निजी जीवन का मूल्यांकन करना नहीं है, बल्कि उन बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है जो अपने जैविक पिता की पहचान जानना चाहते हैं और कानून के तहत अपने अधिकारों का दावा कर रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दायर भरण-पोषण (Maintenance) याचिका से जुड़ा है। गीता देवी और उनके तीन बच्चों ने दावा किया कि रवि कुमार ने उनके साथ विवाह जैसे संबंध में रहकर परिवार बसाया था और तीनों बच्चों का जन्म उसी संबंध से हुआ।
रवि कुमार ने इन सभी दावों का विरोध करते हुए कहा कि उनका विवाह वर्ष 1986 से ही दूसरी महिला से वैध रूप से हुआ था। उन्होंने गीता देवी से किसी भी प्रकार के वैवाहिक या पारिवारिक संबंध से इनकार किया और बच्चों का जैविक पिता होने से भी इंकार किया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि डीएनए परीक्षण से उनकी तथा उनकी विधिवत पत्नी की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद प्रारंभिक साक्ष्यों को देखते हुए डीएनए परीक्षण कराने का आदेश दिया। इसी आदेश को रवि कुमार ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस याचिका में विवाह की वैधता का निर्णय नहीं किया जा रहा है। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न केवल यह था कि क्या संबंधित बच्चे याचिकाकर्ता की जैविक संतान हैं, क्योंकि यही प्रश्न उनके भरण-पोषण के अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ है।
अदालत ने पाया कि बच्चों ने स्वयं अपनी जैविक पहचान स्थापित करने के लिए डीएनए परीक्षण की मांग की है। रिकॉर्ड पर विवाह और पारिवारिक तस्वीरें, बच्चों के जन्मदिन के समारोह की तस्वीरें, स्कूल रिकॉर्ड, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र तथा मकान मालकिन की गवाही जैसी सामग्री भी उपलब्ध थी, जिनसे प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता और उत्तरदाता के बीच संबंध रहे हो सकते हैं।
अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि डीएनए परीक्षण सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं कराया जाना चाहिए, लेकिन जहां पितृत्व ही विवाद का मुख्य मुद्दा हो और उपलब्ध साक्ष्य निर्णायक उत्तर देने में पर्याप्त न हों, वहां वैज्ञानिक परीक्षण न्यायहित में आवश्यक हो सकता है।
अदालत ने कहा, "बच्चे का अपने जैविक माता-पिता की पहचान जानने का अधिकार उसकी गरिमा और पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।"
प्रतिष्ठा संबंधी दलील पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं यह कहता है कि उसका संबंधित लोगों से कोई संबंध ही नहीं है, तो डीएनए परीक्षण उसके पक्ष को भी स्पष्ट कर सकता है। केवल संभावित सामाजिक असहजता के आधार पर सत्य की जांच को रोका नहीं जा सकता।
पीठ ने यह भी कहा, "कानून व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन उसी के साथ उन निर्णयों से उत्पन्न कानूनी जिम्मेदारियों को निभाने की अपेक्षा भी करता है, विशेषकर जब उनसे बच्चों के अधिकार प्रभावित होते हों।"
सभी तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में पितृत्व का प्रश्न सीधे तौर पर विचाराधीन है और उसका निर्धारण भरण-पोषण के दावे के लिए आवश्यक है।
अदालत ने यह भी माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद प्रारंभिक सामग्री डीएनए परीक्षण का आधार बनाने के लिए पर्याप्त है और फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश किसी भी प्रकार से अवैध या मनमाना नहीं कहा जा सकता।
इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के डीएनए परीक्षण संबंधी आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां मूल भरण-पोषण वाद के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।
Case Details
Case Title: Ravi Kumar v. Geeta Devi & Ors.
Case Number: CRL.M.C. 3855/2024 & CRL.M.A. 14726/2024
Judge: Hon'ble Dr. Justice Swarana Kanta Sharma
Decision Date: 03 July 2026

















