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सास-ससुर की संपत्ति खाली करेगी बहू: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- साझा घर का अधिकार स्थायी कब्जे का अधिकार नहीं

Shivam Y.

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि साझा घर में रहने का अधिकार स्थायी कब्जे का अधिकार नहीं है और बहू को सास-ससुर की संपत्ति खाली करनी होगी। - श्रीमती रितु तनेजा एवं अन्य। वि. सरकार. दिल्ली के एनसीटी और अन्य।

सास-ससुर की संपत्ति खाली करेगी बहू: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- साझा घर का अधिकार स्थायी कब्जे का अधिकार नहीं
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत “शेयर्ड हाउसहोल्ड” यानी साझा घर में रहने का अधिकार किसी बहू को ससुराल की संपत्ति पर स्थायी कब्जे का अधिकार नहीं देता। अदालत ने सास-ससुर की शांति और गरिमा से रहने के अधिकार को प्राथमिकता देते हुए बहू और उसके बेटे को सफदरजंग एन्क्लेव स्थित मकान खाली करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला रितु तनेजा और उनके बेटे द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। रितु तनेजा के पति पंकज तनेजा का वर्ष 2020 में निधन हो गया था। इसके बाद परिवार में संपत्ति और आर्थिक अधिकारों को लेकर विवाद शुरू हो गया।

सास-ससुर ओम प्रकाश तनेजा और सावित्री तनेजा ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के तहत शिकायत दाखिल कर आरोप लगाया कि बहू और पोते के व्यवहार से उन्हें मानसिक परेशानी हो रही है और वे अपनी ही संपत्ति में शांति से नहीं रह पा रहे।

पहले जिला मजिस्ट्रेट ने केवल ग्राउंड फ्लोर खाली कराने का आदेश दिया था, लेकिन बाद में डिविजनल कमिश्नर ने पूरे मकान से बेदखली का आदेश पारित कर दिया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

रितु तनेजा की ओर से अदालत में कहा गया कि यह घर उनका “शेयर्ड हाउसहोल्ड” है और पति के जीवनकाल से वे वहीं रह रही हैं। उन्होंने दावा किया कि परिवार की संपत्तियां पैतृक कारोबार से बनी हैं, जिनमें उनके दिवंगत पति का हिस्सा था। साथ ही एलआईसी पॉलिसियों और अन्य वित्तीय लाभों में भी अपने और बच्चों के अधिकार की बात कही गई।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि उन्होंने सास की देखभाल की और उनके खिलाफ लगाए गए दुर्व्यवहार के आरोप गलत हैं।

वहीं, सास-ससुर की ओर से कहा गया कि संबंधित संपत्ति उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति है और परिवार में तनाव इतना बढ़ चुका है कि साथ रहना संभव नहीं रह गया। उन्होंने अदालत को बताया कि रितु तनेजा सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं।

यह भी कहा गया कि खिड़की एक्सटेंशन में वैकल्पिक मकान पहले से उपलब्ध है और वे उसके दस्तावेज देने को तैयार हैं, बशर्ते याचिकाकर्ता वर्तमान मकान खाली कर दें।

न्यायमूर्ति पुरुषैन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत चलने वाली कार्यवाही संपत्ति के जटिल स्वामित्व विवाद तय करने का मंच नहीं है।

अदालत ने आदेश में कहा,

“पक्षकारों के संबंध इतने खराब हो चुके हैं कि वे एक ही छत के नीचे शांतिपूर्वक नहीं रह सकते।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि साझा घर में रहने का अधिकार संरक्षण के लिए है, न कि मालिकाना हक देने के लिए। यदि साथ रहना पूरी तरह असंभव हो जाए, तो वरिष्ठ नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को प्राथमिकता दी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी। अदालत ने निर्देश दिया कि सास-ससुर 30 दिनों के भीतर वैकल्पिक संपत्ति और फरीदाबाद के प्लॉट्स के दस्तावेज जमा करें।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं को 45 दिनों के भीतर सफदरजंग एन्क्लेव स्थित मकान खाली करना होगा।

Case Details:

Case Title: Smt. Ritu Taneja & Anr. v. Govt. of NCT of Delhi & Ors.

Case Number: W.P.(C) 12721/2023

Judge: Justice Purushaindra Kumar Kaurav

Decision Date: May 8, 2026

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