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19 साल बाद शिक्षिका को मिला न्याय, दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की स्कूल की बर्खास्तगी

Zaved Khan
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दिल्ली हाईकोर्ट ने रेखा सभरवाल की 2007 की बर्खास्तगी रद्द करते हुए उनकी बहाली, 50% बकाया वेतन और पूरे मामले की नए सिरे से जांच के आदेश दिए। - Rekha Sabharwal v. Management of Saai Memorial Girls School & Ors.

19 साल बाद शिक्षिका को मिला न्याय, दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की स्कूल की बर्खास्तगी

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साई मेमोरियल गर्ल्स स्कूल की पूर्व शिक्षिका रेखा सभरवाल को बड़ी राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि स्कूल ने उन्हें सेवा से हटाने से पहले कानून के तहत आवश्यक निदेशालय शिक्षा (DoE) की पूर्व स्वीकृति नहीं ली थी। कोर्ट ने शिक्षिका की बहाली, सेवा की निरंतरता और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश दिया है, साथ ही पूरे मामले की नए सिरे से जांच कराने का आदेश भी दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

रेखा सभरवाल स्कूल में सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं। अक्टूबर 2006 में उन्हें एक आरोप-पत्र जारी किया गया था, जिसमें पढ़ाने की गुणवत्ता, सहकर्मियों और स्कूल प्रशासन के साथ कथित दुर्व्यवहार तथा अभिभावक-शिक्षक बैठक में शामिल न होने जैसे आरोप लगाए गए थे।

इसके बाद विभागीय जांच हुई और जांच अधिकारी ने अधिकांश आरोपों को सही माना। इसी आधार पर मार्च 2007 में स्कूल प्रबंधन ने उन्हें सेवा से हटा दिया।

सभरवाल ने इस कार्रवाई को दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, लेकिन 2009 में उनकी अपील खारिज हो गई। बाद में हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने भी 2017 में उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की।

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पूर्व स्वीकृति के बिना बर्खास्तगी पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान शिक्षिका की ओर से कहा गया कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम की धारा 8(2) के अनुसार किसी मान्यता प्राप्त निजी स्कूल के कर्मचारी को हटाने से पहले निदेशक शिक्षा की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।

स्कूल ने तर्क दिया कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर यह शर्त लागू नहीं होती। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के राज कुमार बनाम निदेशक शिक्षा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर भी लागू होता है।

अदालत ने कहा,

“निदेशालय शिक्षा की पूर्व स्वीकृति के बिना जारी किया गया बर्खास्तगी आदेश धारा 8(2) का उल्लंघन है और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए।

शिक्षिका का कहना था कि स्कूल की प्रिंसिपल और वाइस-प्रिंसिपल उनके खिलाफ शिकायतकर्ता भी थीं और जांच में गवाह के रूप में भी पेश हुई थीं। इसके बावजूद वे अनुशासनात्मक समिति का हिस्सा थीं, जिसने उनके खिलाफ निर्णय लिया।

डिवीजन बेंच ने इस आपत्ति को सही माना।

अदालत ने कहा कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता। यदि किसी अधिकारी ने शिकायतकर्ता या गवाह की भूमिका निभाई है, तो वह अनुशासनात्मक निर्णय लेने वाली समिति का हिस्सा नहीं हो सकता।

पीठ ने कहा,

“प्रिंसिपल और जसवीर कौर को अनुशासनात्मक प्राधिकरण का हिस्सा नहीं होना चाहिए था। इससे पक्षपात की आशंका पैदा होती है।”

सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद कुछ तथ्यों पर भी चिंता जताई।

कोर्ट ने पाया कि रेखा सभरवाल हिंदी विषय की शिक्षिका थीं और करीब साढ़े तीन वर्षों तक उन्होंने यही विषय पढ़ाया। इस दौरान उनके कामकाज को लेकर कोई शिकायत सामने नहीं आई।

अदालत ने नोट किया कि अगस्त 2006 में उन्हें अचानक अंग्रेजी और पर्यावरण विज्ञान पढ़ाने का निर्देश दिया गया, जबकि उनके पास अंग्रेजी विषय में कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता नहीं थी।

इसके बाद ही उनके खिलाफ शिकायतें सामने आने लगीं।

पीठ ने कहा कि स्कूल यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि हिंदी पढ़ाने वाली शिक्षिका को अचानक अंग्रेजी पढ़ाने की जिम्मेदारी क्यों दी गई।

बर्खास्तगी आदेश को बताया गैर-कारणयुक्त

कोर्ट ने यह भी माना कि शिक्षिका को सेवा से हटाने वाला अंतिम आदेश पर्याप्त कारणों और तर्कों से रहित था।

अदालत के अनुसार, जब शिक्षिका ने कारण बताओ नोटिस का जवाब दिया था, तब अनुशासनात्मक प्राधिकरण का दायित्व था कि वह उनकी दलीलों पर विचार करे और अपने निर्णय में उसका उल्लेख करे।

पीठ ने कहा,

“न्याय की मूल आवश्यकता थी कि शिक्षिका द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर निष्पक्ष विचार किया जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।”

फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने रेखा सभरवाल की अपील स्वीकार करते हुए 2007 की जांच रिपोर्ट, बर्खास्तगी आदेश, दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल के फैसले और 2017 के एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि:

रेखा सभरवाल को, यदि वे सेवानिवृत्ति की आयु पार नहीं कर चुकी हैं, तो सेवा में बहाल किया जाए और उनकी सेवा निरंतर मानी जाए। उन्हें 50 प्रतिशत बकाया वेतन भी दिया जाए, बशर्ते वे यह हलफनामा दें कि इस अवधि में वे किसी अन्य लाभकारी रोजगार में नहीं थीं।

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि 16 अक्टूबर 2006 के आरोप-पत्र के आधार पर पूरी विभागीय जांच नए सिरे से कराई जाए। इसके लिए शिक्षा निदेशालय एक स्वतंत्र जांच अधिकारी नियुक्त करेगा। यदि भविष्य में कोई दंडात्मक कार्रवाई प्रस्तावित की जाती है, तो उससे पहले दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम के तहत आवश्यक पूर्व स्वीकृति प्राप्त करनी होगी।

Case Details:

Case Title: Rekha Sabharwal v. Management of Saai Memorial Girls School & Ors.

Case Number: LPA 266/2017

Judge: Justice C. Hari Shankar and Justice Om Prakash Shukla

Decision Date: 29 May 2026

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