दिल्ली हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक महिला की दूसरी अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब पति का अपनी बहन की संपत्ति में रहने का अधिकार समाप्त हो गया और उसने मकान छोड़ दिया, तो उसकी पत्नी भी उस संपत्ति पर रहने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं जता सकती।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के उन आदेशों को बरकरार रखा, जिनमें महिला को संपत्ति खाली कर मालिक को कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद पश्चिमी दिल्ली के रमेश नगर स्थित एक मकान से जुड़ा था। मीरा बत्रा ने दावा किया कि यह संपत्ति उनकी मां माया देवी की थी, जिन्होंने 6 फरवरी 2012 को वसीयत के जरिए इसे उनके नाम कर दिया था। मां के निधन के बाद मीरा बत्रा इस संपत्ति की मालिक बन गईं।
मीरा बत्रा के अनुसार, उनके भाई मुनीश कुमार लखीना ने मां के निधन के बाद उनसे अनुरोध किया था कि उन्हें ग्राउंड फ्लोर पर रहने दिया जाए। पारिवारिक संबंधों को देखते हुए उन्होंने भाई को वहां रहने की अनुमति दे दी। बाद में अक्टूबर 2012 में मुनीश की शादी शालू से हुई और दोनों उसी मकान में रहने लगे।
बाद में परिवार में विवाद बढ़ने पर मीरा बत्रा ने दोनों को मकान खाली करने के लिए कानूनी नोटिस भेजा और कब्जा वापस लेने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
शालू ने अदालत में कहा कि यह उसका वैवाहिक घर (Matrimonial Home) है और उसे वहां रहने का अधिकार है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसकी ननद और पति ने मिलकर उसे घर से निकालने के लिए यह मुकदमा दायर किया है।
उसने वसीयत की वैधता पर भी सवाल उठाए और कहा कि उसे घरेलू हिंसा कानून के तहत निवास संबंधी संरक्षण मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए पाया कि मीरा बत्रा संपत्ति की वैध मालिक हैं और यह तथ्य निचली अदालतों में साबित हो चुका है।
अदालत ने कहा कि शालू शादी के बाद अपने पति के साथ इस संपत्ति में रहने आई थी। उसका वहां रहना पूरी तरह पति के अधिकार पर आधारित था, जिसे स्वयं मालिक ने अनुमति दी थी।
फैसले में अदालत ने कहा, “मुख्य प्रश्न यह है कि अपीलकर्ता का संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने का क्या अधिकार है।” आगे अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पति का वहां रहने का अधिकार समाप्त हो गया और उसने मकान छोड़ दिया, तो पत्नी की स्थिति भी स्वतंत्र रूप से बेहतर नहीं रह सकती।
कोर्ट ने कहा, “एक बार पति का अधिकार समाप्त हो गया और उसने परिसर खाली कर दिया, तो अपीलकर्ता की स्थिति अतिक्रमणकारी (Trespasser) से बेहतर नहीं रह जाती और वह संपत्ति खाली करने के लिए बाध्य है।”
शालू ने तर्क दिया कि उसे घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत निवास का अधिकार प्राप्त है। इस पर अदालत ने कहा कि यदि उसे वैकल्पिक आवास या अन्य राहत चाहिए, तो उसका दावा उसके पति के खिलाफ हो सकता है, न कि उस बहन के खिलाफ जो संपत्ति की मालिक है।
अदालत ने टिप्पणी की, “पति-पत्नी के बीच का विवाद उस ननद के लिए दंड नहीं बन सकता जिसने सद्भावना में उन्हें अपनी संपत्ति में रहने की अनुमति दी थी।”
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि मामले में कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न नहीं बनता है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत दोनों ने तथ्यों और कानून का सही मूल्यांकन किया है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने शालू की नियमित द्वितीय अपील (Regular Second Appeal) खारिज कर दी और निचली अदालतों द्वारा पारित कब्जा सौंपने तथा संपत्ति में किसी तीसरे पक्ष का हित न बनाने संबंधी आदेशों को बरकरार रखा।
Case Details
Case Title: Shalu v. Meera Batra & Anr.
Case Number: RSA 22/2022
Judge: Justice Neena Bansal Krishna
Decision Date: June 5, 2026
















