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तलाक के मामले में DNA टेस्ट की मांग करने से पहले पति को यह साबित करना होगा कि उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था: झारखंड हाई कोर्ट

Shivam
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झारखंड हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का डीएनए टेस्ट तभी कराया जा सकता है, जब पति पहले यह साबित करे कि गर्भधारण की अवधि में उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था।

तलाक के मामले में DNA टेस्ट की मांग करने से पहले पति को यह साबित करना होगा कि उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था: झारखंड हाई कोर्ट

झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल व्यभिचार (Adultery) का आरोप लगाने भर से अदालत डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं दे सकती। यदि पति यह दावा करता है कि विवाह के दौरान जन्मा बच्चा उसका नहीं है, तो उसे पहले यह स्पष्ट रूप से साबित करना होगा कि गर्भधारण की संभावित अवधि के दौरान उसका अपनी पत्नी से कोई संपर्क (Non-Access) नहीं थी। अदालत ने इसी आधार पर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति की डीएनए टेस्ट कराने की मांग खारिज कर दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। उसका कहना था कि जुलाई 2000 में विवाह के बाद वह जनवरी 2001 में नौकरी के लिए सूरत चला गया था और अप्रैल 2002 तक वहीं रहा। जब वह वापस लौटा तो उसने अपनी पत्नी को गर्भवती पाया। इसके बाद उसने दावा किया कि पत्नी से जन्मा पुत्र उसका जैविक पुत्र नहीं है और इसे साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने की मांग की।

फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2011 में यह आवेदन खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ पति ने झारखंड हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट की टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनूभा रावत चौधरी ने पाया कि पति ने अपनी मूल तलाक याचिका में यह तो कहा था कि वह सूरत में रह रहा था, लेकिन उसने कहीं भी यह स्पष्ट नहीं कहा कि गर्भधारण की संभावित अवधि के दौरान उसका पत्नी से कोई संपर्क या पहुंच (Non-Access) नहीं था।

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अदालत ने कहा कि केवल अलग शहर में रहने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। कानून के अनुसार, यदि विवाह के दौरान बच्चे का जन्म होता है तो उसकी वैधता को चुनौती देने के लिए पति को मजबूत प्रथमदृष्टया (Prima Facie) मामला स्थापित करना होगा।

पीठ ने कहा,

"डीएनए टेस्ट का आदेश तभी दिया जा सकता है जब पति प्रथमदृष्टया मजबूत मामला स्थापित करे और यह दिखाए कि गर्भधारण की संभावित अवधि में पत्नी तक उसकी कोई पहुंच नहीं थी।"

अदालत ने यह भी नोट किया कि पति ने "कभी सहवास नहीं हुआ" (Never Cohabited) जैसी बात डीएनए टेस्ट के आवेदन में पहली बार कही थी, जबकि ऐसी कोई स्पष्ट दलील मूल तलाक याचिका में मौजूद नहीं थी।

बच्चे की निजता पर भी अदालत ने दिया महत्व

हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि जब डीएनए टेस्ट की मांग की गई थी, तब बच्चा नाबालिग था, लेकिन लंबे समय तक मामला लंबित रहने के दौरान वह वयस्क हो चुका है।

अदालत ने कहा कि अब मां उसके स्थान पर डीएनए टेस्ट के लिए सहमति नहीं दे सकती। साथ ही, बच्चा इस मामले में पक्षकार भी नहीं है और उसे वयस्क होने के बाद भी पक्षकार नहीं बनाया गया। ऐसे में अदालत उसे डीएनए टेस्ट कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।

पीठ ने कहा,

"बच्चों को पति-पत्नी के वैवाहिक विवाद का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए और डीएनए टेस्ट का आदेश सामान्य रूप से नहीं दिया जा सकता।"

हाई कोर्ट ने डीएनए टेस्ट से जुड़े कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख किया और कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन ऐसे परीक्षण का आदेश केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए।

अदालत ने दोहराया कि जब तक पति यह स्पष्ट रूप से नहीं दिखाता कि गर्भधारण के समय उसकी पत्नी तक उसकी पहुंच नहीं थी, तब तक भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता से जुड़ी कानूनी धारणा को नहीं तोड़ा जा सकता।

अदालत का फैसला

रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों का विश्लेषण करने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश पूरी तरह सही था।

अदालत ने कहा कि पति अपनी तलाक याचिका में "Non-Access" का आवश्यक आधार ही प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके अलावा, अब बच्चा वयस्क हो चुका है और उसे डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने पति की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: L. K. M. v. F. D.

Case Number: W.P. (C) No. 576 of 2012

Judge: Justice Anubha Rawat Choudhary

Decision Date: 29 June 2026

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