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ईडी अधिकारियों पर दर्ज FIR को चुनौती: झारखंड हाईकोर्ट ने रोस्टर आपत्ति खारिज की, कहा-न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटना उचित नहीं

Shivam
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प्रतीक और अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य - झारखंड उच्च न्यायालय ने कथित हिरासत में मारपीट के मामले में स्वतंत्र जांच की आवश्यकता का हवाला देते हुए ईडी अधिकारियों के खिलाफ रांची एफआईआर को सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया।

ईडी अधिकारियों पर दर्ज FIR को चुनौती: झारखंड हाईकोर्ट ने रोस्टर आपत्ति खारिज की, कहा-न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटना उचित नहीं

झारखंड हाईकोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के दो अधिकारियों द्वारा दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने और जांच को CBI को सौंपने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने राज्य की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यह मामला इस पीठ के रोस्टर में नहीं आता।

न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने कहा कि उपलब्ध रोस्टर के अनुसार इस प्रकार के आपराधिक रिट मामलों की सुनवाई इस पीठ के अधिकार क्षेत्र में आती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ED के दो अधिकारियों एक सहायक निदेशक और एक सहायक प्रवर्तन अधिकारी द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है। दोनों अधिकारियों ने रांची के एयरपोर्ट थाने में दर्ज FIR को चुनौती दी है।

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यह FIR 13 जनवरी 2026 को दर्ज की गई थी जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कई धाराओं जैसे मारपीट, गलत तरीके से बंधक बनाना और हत्या के प्रयास से जुड़ी धाराएं शामिल की गई थीं।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि शिकायतकर्ता संतोष कुमार, जो कथित तौर पर लगभग 23 करोड़ रुपये के सरकारी धन के गबन के मामले में आरोपी है, ED कार्यालय में खुद पहुंचा था। अधिकारियों के अनुसार बातचीत के दौरान उसने खुद ही पानी के जग से अपने सिर पर वार कर लिया जिससे मामूली चोट लगी। बाद में उसे अस्पताल ले जाकर इलाज कराया गया।

अधिकारियों का आरोप था कि इसके बाद उनके खिलाफ झूठी FIR दर्ज कराई गई ताकि चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच को प्रभावित किया जा सके।

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सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह आपत्ति उठाई कि इस मामले की सुनवाई इस पीठ के रोस्टर में नहीं आती और इसे किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।

इस पर अदालत ने रोस्टर का उल्लेख करते हुए कहा कि आपराधिक रिट याचिकाएं, खासकर वे जिनमें CBI जांच से जुड़ा पहलू हो, इस पीठ के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।

अदालत ने यह भी नोट किया कि मामले की पहली सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील ने ऐसी कोई आपत्ति नहीं उठाई थी और बाद में इसे उठाया गया।

पीठ ने टिप्पणी की:

“सिर्फ इसलिए कि किसी पक्ष का वरिष्ठ वकील उपस्थित है और वह अदालत से स्वयं को मामले से अलग करने का अनुरोध करता है, अदालत ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है।”

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अदालत ने आगे कहा कि न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह बिना किसी भय या दबाव के अपना संवैधानिक दायित्व निभाए।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी न्यायाधीश से मनचाही पीठ चुनने के लिए ‘रिक्यूज़ल’ की मांग नहीं की जा सकती।

पीठ ने कहा:

“रिक्यूज़ल का रास्ता कई बार सुविधाजनक विकल्प बन जाता है, लेकिन यदि रोस्टर स्पष्ट है तो न्यायाधीश को अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।”

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका पर दबाव डालने या किसी विशेष पीठ को चुनने की कोशिश न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य द्वारा दायर अंतरिम आवेदन (I.A. No. 2655 of 2026) को खारिज कर दिया, जिसमें रोस्टर को लेकर आपत्ति उठाई गई थी।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध रोस्टर के आधार पर यह मामला इसी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सही तरीके से सूचीबद्ध किया गया है और इस पर सुनवाई जारी रहेगी।

Case Title: Pratik & Another vs State of Jharkhand & Others

Case Number: W.P. (Cr.) No. 52 of 2026

Judgment Pronounced: 11 March 2026

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