राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दुष्कर्म सहित भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता और आरोपी ने एफआईआर दर्ज होने से पहले अपनी इच्छा से विवाह किया था, बाद में वर्षों के अलगाव के बाद फिर साथ रहने लगे और अब दोनों परिवारों की सहमति से पति-पत्नी के रूप में वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
न्यायमूर्ति बलजिंदर सिंह संधू ने कहा कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों में मुकदमा जारी रखने से न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि पक्षकारों के स्थापित वैवाहिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पंकज गोयल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख करते हुए एफआईआर संख्या 202/2020 से उत्पन्न पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। यह एफआईआर जोधपुर के सूरसागर थाने में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376, 376(2)(n), 377, 384, 506 और 450 के तहत दर्ज की गई थी। याचिका में कहा गया कि अब दोनों पक्षों के बीच विवाद समाप्त हो चुका है और वे पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता स्वयं अदालत में उपस्थित हुई। उसने बताया कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही उसने याचिकाकर्ता से विवाह कर लिया था। विवाह के बाद दोनों अपने-अपने घर लौट गए थे, लेकिन जब उसके माता-पिता को इस विवाह की जानकारी मिली तो परिवार के दबाव में एफआईआर दर्ज कराई गई। बाद में दिसंबर 2025 में वह फिर से याचिकाकर्ता के साथ रहने लगी। इसके बाद दोनों परिवारों ने उनके संबंध को स्वीकार कर लिया और 25 दिसंबर 2025 से दोनों पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं।
राज्य की ओर से उपस्थित लोक अभियोजक ने अदालत को बताया कि मुकदमे की सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है और अधिकांश अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं। हालांकि, यह विवादित नहीं था कि वर्तमान में दोनों पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं। शिकायतकर्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने भी अदालत को बताया कि अब विवाद का आपसी समाधान हो चुका है।
अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2020 में विवाह के समय दोनों पक्ष बालिग थे और उनके संबंध छह वर्षों से अधिक समय तक बने रहे। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर माना कि आपराधिक कार्यवाही परिवार के दबाव के कारण शुरू हुई थी और अब दोनों ने अपनी इच्छा से वैवाहिक जीवन जारी रखने का निर्णय लिया है।
अदालत ने प्रशांत भारतीय बनाम दिल्ली राज्य, मधुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य और महेश मुकुंद पटेल बनाम यूपी राज्य सहित सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यद्यपि दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोपों वाले मामलों में समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त करना सामान्य नियम नहीं है, लेकिन प्रत्येक मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग कर सकती है, यदि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक हो।
पीठ ने कहा, "दोनों पक्षों का संबंध लगभग छह वर्षों की न्यायिक कार्यवाही के बावजूद बना रहा है। वे पुनः एकजुट हुए हैं और वर्तमान में पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं।"
अदालत ने आगे कहा, "इन परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न तो न्याय के उद्देश्य की पूर्ति करेगा और न ही आपराधिक कानून के मकसद को आगे बढ़ाएगा।"
अदालत का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सत्र वाद संख्या 14/2021 तथा एफआईआर संख्या 202/2020 से संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के स्पष्ट रुख, दोनों पक्षों के वर्तमान वैवाहिक जीवन और मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसके साथ ही लंबित सभी आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
Case Details
Case Title: Pankaj Goyal v. State of Rajasthan & Anr.
Case Number: S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 4770/2026
Judge: Hon'ble Mr. Justice Baljinder Singh Sandhu
Decision Date: 08 July 2026



















