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किसी कथित उग्रवादी की पत्नी होना और बच्चे के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद रहना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: झारखंड हाई कोर्ट ने महिला को किया बरी

Shivam
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झारखंड हाई कोर्ट ने कहा कि केवल कथित उग्रवादी की पत्नी होना और बच्चे के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद रहना, बिना प्रत्यक्ष साक्ष्य के, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता और महिला को बरी कर दिया। - प्रमिला देवी बनाम झारखंड राज्य

किसी कथित उग्रवादी की पत्नी होना और बच्चे के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद रहना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: झारखंड हाई कोर्ट ने महिला को किया बरी

झारखंड हाई कोर्ट ने वर्ष 2004 के एक मुठभेड़ मामले में दोषी ठहराई गई महिला को बरी करते हुए कहा कि केवल किसी कथित उग्रवादी की पत्नी होना या अपने छोटे बच्चे के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद होना, बिना ठोस साक्ष्य के, आपराधिक दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष महिला की किसी सक्रिय भूमिका या अपराध में प्रत्यक्ष भागीदारी को साबित नहीं कर सका।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील प्रमिला देवी ने वर्ष 2007 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर की थी। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट तथा क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।

अभियोजन के अनुसार, जनवरी 2004 में गुमला जिले के निनार गांव के पास पुलिस और सीआरपीएफ ने उग्रवादियों की तलाश में अभियान चलाया था। इस दौरान पुलिस और कथित उग्रवादियों के बीच मुठभेड़ हुई। दो लोगों की मौत हो गई जबकि कई अन्य मौके से भाग निकले। पुलिस ने प्रमिला देवी और एक अन्य महिला को घटनास्थल से हिरासत में लिया। उस समय प्रमिला देवी की गोद में करीब डेढ़ वर्ष की बच्ची भी थी। घटनास्थल से हथियार, गोला-बारूद और अन्य सामग्री बरामद किए जाने का दावा किया गया था।

हाई कोर्ट की टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया और पाया कि अभियोजन पक्ष महिला के खिलाफ कोई ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

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अदालत ने कहा कि किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि प्रमिला देवी ने पुलिस पर गोली चलाई, किसी हमले में हिस्सा लिया या उनके कब्जे से कोई हथियार बरामद हुआ। कई गवाहों ने स्वीकार किया कि गिरफ्तारी के समय महिला की गोद में एक छोटा बच्चा था।

कोर्ट ने यह भी पाया कि एक पुलिस गवाह ने बाद में यह कहकर अभियोजन के मामले को मजबूत करने की कोशिश की कि महिला के पास से पिस्तौल मिली थी, जबकि उसके पहले दिए गए बयान में ऐसी कोई बात नहीं थी और अन्य गवाहों ने भी इस दावे की पुष्टि नहीं की।

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि प्रमिला देवी किसी उग्रवादी संगठन की सक्रिय सदस्य थीं। उनके खिलाफ किसी अन्य आपराधिक मामले का भी रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया।

इन्हीं परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ घटनास्थल पर मौजूद होना, वह भी डेढ़ वर्ष के बच्चे के साथ, और केवल इस आधार पर कि वह एक कथित उग्रवादी की पत्नी हैं, उनकी दोषसिद्धि को कायम रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।"

अदालत ने आगे कहा कि अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि महिला के कब्जे से कोई हथियार या अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई थी अथवा उन्होंने किसी अपराध में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी।

अदालत का फैसला

हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और केवल महिला की कथित उग्रवादी से वैवाहिक संबंध तथा घटनास्थल पर मौजूदगी के आधार पर उन्हें दोषी ठहरा दिया।

हालांकि प्रमिला देवी अपनी पूरी सजा काट चुकी थीं और वर्ष 2011 में रिहा हो चुकी थीं, फिर भी हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला बरी किए जाने योग्य है।

इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द करते हुए प्रमिला देवी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उनकी आपराधिक अपील स्वीकार कर ली।

Case Details

Case Title: Pramila Devi v. The State of Jharkhand

Case Number: Cr. Appeal (S.J.) No. 597 of 2009

Judge: Justice Anubha Rawat Choudhary

Decision Date: 06 July 2026

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